उर्दू पोएट शाह मुबारक आबरू की शायरी व शेर

Urdu Poet Shah Mubarak Abroo Ki Shayari Va Sher : उर्दू के महान कवि शाह मुबारक आबरू जी का जन्म लखनऊ में 1685 में हुआ था 1967 में होने वाले अब तक के सबसे प्रसिद्ध संग्रह दीवान-ए-आबरू इन्ही के द्वारा लिखा गया संग्रह है इनकी मृत्यु 1733 में हुई थी | मृत्यु होने से पहले तक इन्होने अपना नाम उर्दू जगत में बड़ी ही शिद्दत से लिखवा चुके थे | इनके द्वारा कई प्रकार की शेरो-शायरियां व ग़ज़लें की गयी है जिनको जानने के लिए आप हमारे द्वारा बताई गयी जानकारी को पढ़ सकते है जिसमे की हमने आपको बहुत ही बेहतरीन शायरियां बताई है जिन्हे आप पढ़ सकते है |

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Ghazals of Abroo Shah Mubarak

मुफ़्लिसी सीं अब ज़माने का रहा कुछ हाल नईं
आसमाँ चर्ख़ी के जूँ फिरता है लेकिन माल नईं

मैं निबल तन्हा न इस दुनिया की सोहबत सीं हुआ
रुस्तमों कूँ कर दिया है ना-तवाँ इंज़ाल नीं

मेहराब-ए-अबरुवाँ कूँ वसमा हुआ है ज़ेवर
क्यूँ कर कहें न उन कूँ अब ज़ीनतुल-मसाजिद

मिल गईं आपस में दो नज़रें इक आलम हो गया
जो कि होना था सो कुछ अँखियों में बाहम हो गया

मिल गया था बाग़ में माशूक़ इक नक-दार सा
रंग ओ रू में फूल की मानिंद सज में ख़ार सा

नमकीं गोया कबाब हैं फीके शराब के
बोसा है तुझ लबाँ का मज़े-दार चटपटा

तुम्हारे दिल में क्या ना-मेहरबानी आ गई ज़ालिम
कि यूँ फेंका जुदा मुझ से फड़कती मछली को जल सीं

तुम्हारे लोग कहते हैं कमर है
कहाँ है किस तरह की है किधर है

तुम्हारी देख कर ये ख़ुश-ख़िरामी आब-रफ़्तारी
गया है भूल हैरत सीं पिया पानी के तईं बहना

साथ मेरे तेरे जो दुख था सो प्यारे ऐश था
जब सीं तू बिछड़ा है तब सीं ऐश सब ग़म हो गया

सर कूँ अपने क़दम बना कर के
इज्ज़ की राह मैं निबहता हूँ

फिरते थे दश्त दश्त दिवाने किधर गए
वे आशिक़ी के हाए ज़माने किधर गए

बोसाँ लबाँ सीं देने कहा कह के फिर गया
प्याला भरा शराब का अफ़्सोस गिर गया

जब कि ऐसा हो गंदुमी माशूक़
नित गुनहगार क्यूँ न हो आदम

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Shayari of Abroo Shah Mubarak

जब सीं तिरे मुलाएम गालों में दिल धँसा है
नर्मी सूँ दिल हुआ है तब सूँ रुई का गाला

जलता है अब तलक तिरी ज़ुल्फ़ों के रश्क से
हर-चंद हो गया है चमन का चराग़ गुल

बोसे में होंट उल्टा आशिक़ का काट खाया
तेरा दहन मज़े सीं पुर है पे है कटोरा

रोवने नीं मुझ दिवाने के किया सियानों का काम
सैल सीं अनझुवाँ के सारा शहर वीराँ हो गया

शेर को मज़मून सेती क़द्र हो है ‘आबरू’
क़ाफ़िया सेती मिलाया क़ाफ़िया तो क्या हुआ

वस्ल की अर्ज़ का जब वक़्त कभी पाता हूँ
जा हैं ख़ामोशी सीं तब लब मिरे आपस में मिल

यारो हमारा हाल सजन सीं बयाँ करो
ऐसी तरह करो कि उसे मेहरबाँ करो

यूँ ‘आबरू’ बनावे दिल में हज़ार बातें
जब रू-ब-रू हो तेरे गुफ़्तार भूल जावे

हो गए हैं पैर सारे तिफ़्ल-ए-अश्क
गिर्या का जारी है अब लग सिलसिला

हुआ है हिन्द के सब्ज़ों का आशिक़
न होवें ‘आबरू’ के क्यूँ हरे बख़्त

तुम यूँ सियाह-चश्म ऐ सजन मुखड़े के झुमकों से हुए
ख़ुर्शीद नीं गर्मी गिरी तब तो हिरन काला हुआ

तुम्हारे देखने के वास्ते मरते हैं हम खल सीं
ख़ुदा के वास्ते हम सीं मिलो आ कर किसी छल सीं

ब्यारे तिरे नयन कूँ आहू कहे जो कोई
वो आदमी नहीं है हैवान है बेचारा

Ghazals of Abroo Shah Mubarak

Mubarak Shayari Hindi

ग़म सीं अहल-ए-बैत के जी तो तिरा कुढ़ता नहीं
यूँ अबस पढ़ता फिरा जो मर्सिया तो क्या हुआ

जंगल के बीच वहशत घर में जफ़ा ओ कुल्फ़त
ऐ दिल बता कि तेरे मारे हम अब किधर जाँ

फ़ानी-ए-इश्क़ कूँ तहक़ीक़ कि हस्ती है कुफ़्र
दम-ब-दम ज़ीस्त नें मेरी मुझे ज़ुन्नार दिया

मालूम अब हुआ है आ हिन्द बीच हम कूँ
लगते हैं दिल-बराँ के लब रंग-ए-पाँ से क्या ख़ूब

तिरे रुख़सारा-ए-सीमीं पे मारा ज़ुल्फ़ ने कुंडल
लिया है अज़दहा नीं छीन यारो माल आशिक़ का

तुझ हुस्न के बाग़ में सिरीजन
ख़ुर्शीद गुल-ए-दोपहरिया है

तिरा क़द सर्व सीं ख़ूबी में चढ़ है
लटक सुम्बुल सेती ज़ुल्फ़ाँ सीं बढ़ है

तुम नज़र क्यूँ चुराए जाते हो
जब तुम्हें हम सलाम करते हैं

जो कि बिस्मिल्लाह कर खाए तआम
तो ज़रर नईं गो कि होवे बिस मिला

क्यूँ न आ कर उस के सुनने को करें सब यार भीड़
‘आबरू’ ये रेख़्ता तू नीं कहा है धूम का

क्या सबब तेरे बदन के गर्म होने का सजन
आशिक़ों में कौन जलता था गले किस के लगा

क्यूँ कर बड़ा न जाने मुंकिर नपे को अपने
इंकार उस का नाना और शैख़ है नवासा

क्यूँ मलामत इस क़दर करते हो बे-हासिल है ये
लग चुका अब छूटना मुश्किल है उस का दिल है ये

क्यूँ तिरी थोड़ी सी गर्मी सीं पिघल जावे है जाँ
क्या तू नें समझा है आशिक़ इस क़दर है मोम का

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Abroo Shah Mubarak Sher And Poetry

क़द सर्व चश्म नर्गिस रुख़ गुल दहान ग़ुंचा
करता हूँ देख तुम कूँ सैर-ए-चमन ममोला

ख़ुदावंदा करम कर फ़ज़्ल कर अहवाल पर मेरे
नज़र कर आप पर मत कर नज़र अफ़आल पर मेरे

किया है चाक दिल तेग़-ए-तग़ाफ़ुल सीं तुझ अँखियों नीं
निगह के रिश्ता ओ सोज़न सूँ पलकाँ के रफ़ू कीजे

तवाफ़-ए-काबा-ए-दिल कर नियाज़-ओ-ख़ाकसारी सीं
वज़ू दरकार नईं कुछ इस इबादत में तयम्मुम कर

तिरा हर उज़्व प्यारे ख़ुश-नुमा है उज़्व-ए-दीगर सीं
मिज़ा सीं ख़ूब-तर अबरू ओ अबरू सीं भली अँखियाँ

दिल्ली में दर्द-ए-दिल कूँ कोई पूछता नहीं
मुझ कूँ क़सम है ख़्वाजा-क़ुतुब के मज़ार की

दिवाने दिल कूँ मेरे शहर सें हरगिज़ नहीं बनती
अगर जंगल का जाना हो तो उस की बात सब बन जा

दूर ख़ामोश बैठा रहता हूँ
इस तरह हाल दिल का कहता हूँ

दिल कब आवारगी को भूला है
ख़ाक अगर हो गया बगूला है

दिलदार की गली में मुकर्रर गए हैं हम
हो आए हैं अभी तो फिर आ कर गए हैं हम

दाग़ सीं क्यूँ न दिल उजाला हो
चश्म की रौशनी सियाही है

डर ख़ुदा सीं ख़ूब नईं ये वक़्त-ए-क़त्ल-ए-आम कूँ
सुब्ह कूँ खोला न कर इस ज़ुल्फ़-ए-ख़ून-आशाम कूँ

दिखाई ख़्वाब में दी थी टुक इक मुँह की झलक हम कूँ
नहीं ताक़त अँखियों के खोलने की अब तलक हम कूँ

क़ौल ‘आबरू’ का था कि न जाऊँगा उस गली
हो कर के बे-क़रार देखो आज फिर गया

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