Essay (Nibandh)

स्वामी विवेकानंद पर भाषण | Swami Vivekananda Jayanti | Pdf Download

स्वामी विवेकानंद एक हिंदू भिक्षु थे और भारत के सबसे प्रसिद्ध आध्यात्मिक नेताओं में से एक थे। वह सिर्फ एक आध्यात्मिक दिमाग से अधिक था; वह एक प्रखर विचारक, महान वक्ता और भावुक देशभक्त थे। उन्होंने अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के स्वतंत्र चिंतन को एक नए प्रतिमान में आगे बढ़ाया।

उन्होंने गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा में, अपने देश के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने, समाज की भलाई के लिए अथक प्रयास किया। वह हिंदू आध्यात्मवाद के पुनरुत्थान के लिए जिम्मेदार थे और विश्व मंच पर एक श्रद्धेय धर्म के रूप में हिंदू धर्म की स्थापना की।

सार्वभौमिक भाईचारे और आत्म-जागृति का उनका संदेश दुनिया भर में व्यापक राजनीतिक उथल-पुथल की वर्तमान पृष्ठभूमि में प्रासंगिक बना हुआ है। युवा भिक्षु और उनकी शिक्षाएँ कई लोगों के लिए प्रेरणा रही हैं, और उनके शब्द विशेष रूप से देश के युवाओं के लिए आत्म-सुधार के लक्ष्य बन गए हैं।

Swami Vivekananda Speech in Hindi

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#1. Speech in 100 words

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी सन्‌ 1863 को हुआ। उनका घर का नाम नरेंद्र दत्त था। उनके पिता श्री विश्वनाथ दत्त पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे। वे अपने पुत्र नरेंद्र को भी अंगरेजी पढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता के ढंग पर ही चलाना चाहते थे। नरेंद्र की बुद्धि बचपन से बड़ी तीव्र थी और परमात्मा को पाने की लालसा भी प्रबल थी। इस हेतु वे पहले ब्रह्म समाज में गए किंतु वहां उनके चित्त को संतोष नहीं हुआ।

सन्‌ 1884 में श्री विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गई। घर का भार नरेंद्र पर पड़ा। घर की दशा बहुत खराब थी। कुशल यही थी कि नरेंद्र का विवाह नहीं हुआ था। अत्यंत गरीबी में भी नरेंद्र बड़े अतिथि-सेवी थे। स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते, स्वयं बाहर वर्षा में रातभर भीगते-ठिठुरते पड़े रहते और अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते।

वर्तमान में भारत के युवा जि‍स महापुरुष के विचारों को आदर्श मानकर उससे प्रेरित होते हैं, युवाओं के वे मार्गदर्शक और भारतीय गौरव हैं स्वामी विवेकानंद।भारत की गरिमा को वैश्विक स्तर पर सम्मान के साथ बरकरार रखने के लिए स्वामी विवेकानंद के कई उदाहरण इतिहास में मिलते हैं।

#2. Speech in 300 words

स्वामी विवेकानन्द अपना जीवन अपने गुरुदेव स्वामी रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर चुके थे। गुरुदेव के शरीर-त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुम्ब की नाजुक हालत की परवाह किए बिना, स्वयं के भोजन की परवाह किए बिना गुरु सेवा में सतत हाजिर रहे। गुरुदेव का शरीर अत्यंत रुग्ण हो गया था। कैंसर के कारण गले में से थूक, रक्त, कफ आदि निकलता था। इन सबकी सफाई वे खूब ध्यान से करते थे।

रामकृष्ण परमहंस की प्रशंसा सुनकर नरेंद्र उनके पास पहले तो तर्क करने के विचार से ही गए थे किंतु परमहंसजी ने देखते ही पहचान लिया कि ये तो वही शिष्य है जिसका उन्हें कई दिनों से इंतजार है। परमहंसजी की कृपा से इनको आत्म-साक्षात्कार हुआ फलस्वरूप नरेंद्र परमहंसजी के शिष्यों में प्रमुख हो गए। संन्यास लेने के बाद इनका नाम विवेकानंद हुआ।

एक बार किसी ने गुरुदेव की सेवा में घृणा और लापरवाही दिखाई तथा घृणा से नाक भौंहें सिकोड़ीं। यह देखकर विवेकानन्द को गुस्सा आ गया। उस गुरुभाई को पाठ पढ़ाते हुए और गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम दर्शाते हुए उनके बिस्तर के पास रक्त, कफ आदि से भरी थूकदानी उठाकर पूरी पी गए।

गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे अपने गुरु के शरीर और उनके दिव्यतम आदर्शों की उत्तम सेवा कर सके। गुरुदेव को वे समझ सके, स्वयं के अस्तित्व को गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके। समग्र विश्व में भारत के अमूल्य आध्यात्मिक खजाने की महक फैला सके। उनके इस महान व्यक्तित्व की नींव में थी ऐसी गुरुभक्ति, गुरुसेवा और गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा।

25 वर्ष की अवस्था में नरेंद्र दत्त ने गेरुआ वस्त्र पहन लिए। तत्पश्चात उन्होंने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की।

#3. Speech in 400 words

स्वामी विवेकानंद की गिनती भारत के महापुरुषों में होती है । उस समय जबकि भारत अंग्रेजी दासता में अपने को दीन-हीन पा रहा था, भारत माता ने एक ऐसे लाल को जन्म दिया जिसने भारत के लोगों का ही नहीं, पूरी मानवता का गौरव बढ़ाया । उन्होंने विश्व के लोगों को भारत के अध्यात्म का रसास्वादन कराया । इस महापुरुष पर संपूर्ण भारत को गर्व है ।

इस महापुरुष का जन्म 12 जनवरी, 1863 ई. में कोलकाता के एक क्षत्रिय परिवार में श्री विश्वनाथ दत्त के यहाँ हुआ था । विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाई कोर्ट के नामी वकील थे । माता-पिता ने बालक का नाम नरेन्द्र रखा । नरेन्द्र बचपन से ही मेधावी थे । उन्होंने 1889 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर कोलकाता के ‘ जनरल असेम्बली ’ नामक कॉलेज में प्रवेश लिया । यहाँ उन्होंने इतिहास, दर्शन, साहित्य आदि विषयों का अध्ययन किया । नरेन्द्र ने बी.ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की ।

नरेन्द्र ईश्वरीय सत्ता और धर्म को शंका की दृष्टि से देखते थे । लेकिन वे जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे । वे अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए ब्रह्मसमाज में गए । यहाँ उनके मन को संतुष्टि नहीं मिली । फिर नरेन्द्र सत्रह वर्ष की आयु में दक्षिणेश्वर के संत रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में आए । परमहंस जी का नरेन्द्र पर गहरा प्रभाव पड़ा । नरेन्द्र ने उन्हें अपना गुरु बना लिया ।
इन्ही दिनों नरेन्द्र के पिता का देहांत हो गया । नरेन्द्र पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई । परंतु अच्छी नौकरी न मिलने के कारण उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा । नरेन्द्र गुरु रामकृष्ण की शरण में गए । गुरु ने उन्हें माँ काली से आर्थिक संकट दूर करने का वरदान माँगने को कहा । नरेन्द्र माँ काली के पास गए परंतु धन की बात भूलकर बुद्धि और भक्ति की याचना की । एक दिन गुरु ने उन्हें अपनी साधना का तेज देकर नरेन्द्र से विवेकानन्द बना दिया ।

रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु के बाद विवेकानन्द कोलकाता छोड़ वरादनगर के आश्रम में रहने लगे । यहाँ उन्होंने शास्त्रों और धर्मग्रंथों का अध्ययन किया । इसके बाद वे भारत की यात्रा पर निकल पड़े । वे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, जूनागढ़, सोमनाथ, पोरबंदर, बड़ौदा, पूना, मैसूर होते हुए दक्षिण भारत पहुँचे । वहाँ से वे पांडिचेरी और मद्रास पहुँचे ।

सन् 1893 में अमेरिका के शिकागो शहर में विश्व धर्म-सम्मेलन हो रहा था । शिष्यों ने स्वामी विवेकानन्द से उसमें भाग लेकर हिन्दू धर्म का पक्ष रखने का आग्रह किया । स्वामी जी कठिनाइयों को झेलते हुए शिकागो पहुँचे । उन्हें सबसे अंत में बोलने के लिए बुलाया गया । परंतु उनका भाषण सुनते ही श्रोता गद्‌गद् हो उठे । उनसे कई बार भाषण कराए गए । दुनिया में उनके नाम की धूम मच गई । इसके बाद उन्होंने अमेरिका तथा यूरोपीय देशों का भ्रमण किया । अमेरिका के बहुत से लोग उनके शिष्य बन गए ।

चार वर्षों में विदेशों में धर्म-प्रचार के बाद विवेकानन्द भारत लौटे । भारत में उनकी ख्याति पहले ही पहुंच चुकी थी । उनका भव्य स्वागत किया गया । स्वामी जी ने लोगों से कहा – ” वास्तविक शिव की पूजा निर्धन और दरिद्र की पूजा में है, रोगी और दुर्बल की सेवा में है । ” भारतीय अध्यात्मवाद के प्रचार और प्रसार के लिए उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की । मिशन की सफलता के लिए उन्होंने लगातार श्रम किया, जिससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया । 4 जुलाई, 1902 ई. को रात्रि के नौ बजे, 39 वर्ष की अल्पायु में ‘ ॐ ‘ ध्वनि के उच्चारण के साथ उनके प्राण-पखेरू उड़ गए । परंतु उनका संदेश कि ‘ उठो जागो और तब तक चैन की साँस न लो जब तक भारत समृद्ध न हो जाय ‘ – हमारा मार्गदर्शन करता रहेगा ।

#4. Speech in 500 words

‘उठो, जागो और अपने लक्ष्य की प्राप्ति से पूर्व मत रुको ।’

यह दिव्य उपदेश स्वामी विवेकानंद द्‌वारा दिया गया था । स्वामी विवेकानंद महामानव के रूप में अवतरित हुए । विश्व के समक्ष हिंदू धर्म और भारतीयता की जो अनुपम छवि स्वामी जी ने प्रस्तुत की वह अद्‌वितीय थी ।

मानव सेवा का लक्ष्य रखते हुए स्वामी जी ने धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए जो कार्य किए उसके लिए मानव समाज सदैव उनका ऋणी रहेगा । भारतीय इतिहास में हिंदू धर्म के महान प्रवर्तकों में उनका नाम सदा अग्रणी रहेगा ।

स्वामी विवेकानंद का बचपन का नाम नरेंद्रनाथ था । उनका जन्म सन् 1863 ई॰ में कोलकाता में हुआ था । वे बचपन से अत्यंत चंचल स्वभाव के थे । अध्ययन में अधिक रुचि न होने के कारण उनका अधिकांश समय खेलकूद में ही बीतता था । उनकी माता धार्मिक आचार-विचार की थीं । नरेंद्रनाथ पर अपनी माता के धार्मिक विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा जिसके फलस्वरूप वे धीरे-धीरे धार्मिक प्रवृत्ति में स्वयं को ढालते चले गए ।

ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति के लिए उनकी इच्छा बढ़ती गई । इसके लिए उन्होंने तत्कालीन संत रामकृष्ण परमहंस की शरण ली । इनकी ओजस्विता को गुरु ने पहचाना और शिक्षा देना प्रांरभ कर दिया । गुरु रामकृष्ण परमहंस जी से उन्हें मानव जाति के कल्याण व उत्थान के लिए कार्य हेतु प्रेरणा मिली ।

वे धीरे-धीरे स्वामी परमहंस के परम शिष्य व उनके अनुयायी बन गए । उन्होंने स्वामी जी के सत्संग में रहकर यह समझा कि संन्यास का वास्तविक अर्थ संसार और स्वयं से विरक्ति नहीं है अपितु इसका उद्‌देश्य मानव कल्याण के लिए कार्य करना है ।

स्वामी परमहंस के देहावसान के उपरांत उन्होंने वेदों और शास्त्रों का गहन अध्ययन किया । सन् 1881 ई॰ में विधिवत् संन्यास के उपरांत वे स्वामी विवेकानंद कहलाए। उसके पश्चात् वे जीवन पर्यंत धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए कृत संकल्पित हो गए ।

सन् 1883 ई॰ में अमेरिका के शिकागो शहर में विश्वधर्म सम्मेलन का आयोजन हुआ जहाँ विश्व के सभी धर्मो के जनप्रतिनिधि एकत्रित हुए । स्वामी विवेकानंद भी हिंदू धर्म के प्रतिनिधि के रूप मैं वहीं गए । सम्मेलन में जब उनकी बारी आई तो वे मंच पर पहुँचे तथा पूर्णत: अद्‌वितीय तरीके से उन्होंने अपना संबोधन ‘अमेरिकावासियो भाइयो और बहनो’ से प्रारंभ किया तो वहाँ बैठे सभी श्रोतागण हर्ष से परिपूरित तथा और भी अधिक एकाग्र हो गए । इसके पश्चात् उन्होंने हिंदू धर्म की महानता और विशालता तथा मानव धर्म के प्रति जो ओजस्वी भाषण दिया उसने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।

धर्म की इतनी सुंदर और सुदृढ़ व्याख्या इससे पूर्व किसी ने नहीं की थी । वहाँ के लोकप्रिय समाचार-पत्र द न्यूयार्क हेराल्ड ने उनके बारे में टिप्पणी की, ”इस धर्म सम्मेलन में विवेकानंद सबसे महान हस्ती हैं । जो देश धर्म ज्ञान में इतना श्रेष्ठ है वहाँ ईसाई-धर्म प्रचारकों को भेजना बहुत ही मूर्खतापूर्ण है । ”

धीरे-धीरे स्वामी जी की ख्याति चारों ओर फैलती गई । अनगिनत लोग उनके अनुयायी बन गए । उसके पश्चात् सभी धर्म सम्मेलनों में उन्हें सादर आमंत्रित किया जाने लगा। वे निरंतर बिना रुके धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य करते रहे ।

अमेरिका और इंग्लैंड के अलावा वे अन्य यूरोपीय देशों में भी गए जहाँ अनेक युवक-युवतियाँ उनके शिष्य बन गए । भारत आकर उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की । कार्य के प्रति उनका समर्पण बढ़ता ही चला गया । अंतत: उनका यही परिश्रम उनकी अस्वस्थता का कारण बना और 1921 ई॰ में वे चिरनिद्रा में लीन हो गए ।

स्वामी विवेकानंद महामानव के रूप में अवतरित हुए । उन्होंने धर्म के प्रचार-प्रसार में जो भूमिका प्रस्तुत की वह अतुलनीय है । वे भारत माँ के सच्चे सपूत थे । इन्होंने भारत का गौरव बढ़ाया और विश्व के समक्ष भारत की अनुपम तस्वीर प्रस्तुत की । उनके कार्य आज भी आदर्श और प्रेरणा के स्रोत हैं ।

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