Sant Ravidas ji : रविदास जी जो कि भारत में 15 वीं शताब्दी के महान कवि, समाज-सुधारक और भगवान के परम भक्तों में से एक थे I जिनेह संत रविदास जी के नाम से भी जाना जाता है I उनका जन्म भारत में यू पी राज्य के वाराणसी नमक शहर के सीर गोवर्धनपुर, में सन 1450 में हुआ था I गुरु रविदास जी ने अपने जीवनकाल में अपने द्वारा रचित रचनाओं तथा दोहों के जरिये समाज में भ्रमण करती बुराइयों (Evils) और कुरीतियों (Curiosity) को दूर किया और उन्होंने अपने दोहों के द्वारा समाज को भक्ति और उदारता के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया I

अतः हम आपको अपने आर्टिकल में रविदास जी के द्वारा रचित दोहे, रैदास के अनमोल वचन, और संत रविदास के दोहे अर्थ सहित प्रस्तुत कर रहे है और आप हमारे आर्टिकल में लिखे दोहों को अपने Friends और Relations में Whatsapp, Facebook और Instagram पर शेयर का सकते है I

Ravidas Ke Dohe

कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।

वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की।
सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की।।

चरन पताल सीस असमांना,
सो ठाकुर कैसैं संपटि समांना।

चारि बेद जाकै सुमृत सासा,
भगति हेत गावै रैदासा।।

गुरु मिलीया रविदास जी दीनी ज्ञान की गुटकी।
चोट लगी निजनाम हरी की महारे हिवरे खटकी।।

जा देखे घिन उपजै, नरक कुंड मेँ बास।
प्रेम भगति सों ऊधरे, प्रगटत जन रैदास।।

संत रविदास के दोहे अर्थ सहित

कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।

अर्थ :- संत रविदास जी कहते हैं कि भगवान एक ही है। उनके राम, कृष्ण, हरी, इश्वर, करीम और राघव (Raghav) अलग-अलग नाम है। सभी वेद, कुरान और पुराण जैसे सभी ग्रंथों में एक ही इश्वर का गुणगान किया हुआ है और ये सभी ग्रन्थ इश्वर की भक्ति का पाठ सिखाते हैं।

रैदास कहै जाकै हदै, रहे रैन दिन राम।
सो भगता भगवंत सम, क्रोध न व्यापै काम।।

अर्थ :- संत रविदास जी इस दोहे के माध्यम से भक्ति में ही शक्ति होती है इसका वर्णन कर रहे हैं। रविदास जी कहते है कि जिस हृदय में दिन-रात राम के नाम का ही वास होता है। वह हृदय स्वयं राम के समान होता है। वे कहते है कि राम के नाम में ही इतनी शक्ति होती है कि व्यक्ति को कभी क्रोध (Anger) नहीं आता और कभी भी कामभावना का शिकार नहीं होता हैं।

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अगाय।।

अर्थ :- संत रविदास जी कहते हैं कि सभी कामों को यदि हम एक साथ शुरू करते हैं तो हमें कभी उनमें सफलता नहीं मिलती है। ठीक उसी प्रकार यदि किसी पेड़ की एक एक टहनी और पति को सींचा जाये और उसकी जड़ को सुखा छोड़ दिया जाये तो वह पेड़ कभी फ़ल नहीं दे पायेगा।

रविदास जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच।
नर कूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच।।

अर्थ :- इस दोहे के माध्यम से संत रविदास जी कहना चाहते है कि कोई भी इन्सान जन्म लेने से ऊँच नीच (Despicable) नहीं होता है। इन्सान के कर्म ही होते हैं जो उसे नीच बना देते हैं। अर्थात् इन्सान के कर्म ही उसे नीच बनाते हैं।

जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।

अर्थ :- इस दोहे में संत रविदास जी कहते हैं कि केले के तने को छिला जाये तो पते के निचे पता और पते के नीचे पता मिलता है और अंत में कुछ भी नहीं मिलता है। ठीक उसी प्रकार इन्सान भी जातियों (Caste) में बंट गया है। उनका कहना है कि इन जातियों ने इन्सान को बांट दिया है। अंत में इन्सान भी खत्म हो जाता है। पर जातियां खत्म नहीं होती है। संत रविदास जी कहते हैं कि जब तक जातियां (Caste) खत्म नहीं होगी तब तक इन्सान एक नहीं हो सकता है।

मन ही पूजा मन ही धूप।
मन ही सेऊं सहज स्वरूप।।

अर्थ :- इस दोहे में रविदास जी कहते है कि भगवान हमेशा एक स्वच्छ (Clean) और निर्मल मन में निवास करते हैं। यदि आपके मन में किसी प्रकार का बेर, लालच (Greed) या द्वेष (Grudge) नहीं है तो आपका मन भगवान का मंदिर, दीपक और धूप (Sunny) के समान है। इस प्रकार के लोगों में ही भगवान हमेशा निवास (Residence) करते हैं।

जा देखे घिन उपजै, नरक कुंड मेँ बास।
प्रेम भगति सों ऊधरे, प्रगटत जन रविदास।।

अर्थ :- रविदास जी कहते है की जिस रविदास को देखने से लोगो को घृणा (Disgust) आती थी, जिनका निवास नर्क कुंद के समान था। ऐसे रविदास का ईश्वर की भक्ति में लीन हो जाना सच में फिर से उनकी मनुष्य के रूप में उत्पत्ति हो गयी है।

रैदास के अनमोल वचन

रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।
तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।

“गुरु मिलीया रविदास जी दीनी ज्ञान की गुटकी।
चोट लगी निजनाम हरी की महारे हिवरे खटकी।।”

“विष को प्याला राना जी मिलाय द्यो मेरथानी ने पाये।
कर चरणामित् पी गयी रे, गुण गोविन्द गाये।।”

ऐसा चाहूँ राज मैं जहाँ मिलै सबन को अन्न।
छोट बड़ो सब सम बसै, रैदास रहै प्रसन्न।।

करम बंधन में बन्ध रहियो, फल की ना तज्जियो आस।
कर्म मानुष का धर्म है, सत् भाखै रविदास।।

“मन चंगा तो कठौती में गंगा।”

ब्राह्मण मत पूजिए जो होवे गुणहीन।
पूजिए चरण चंडाल के जो होवे गुण प्रवीन।।

Ravidas Ji Ke Dohe

जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।

कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।

हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा।
दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।।

बांधू न बंधन छांऊं न छाया,
तुमहीं सेऊं निरंजन राया।।

नख प्रसेद जाकै सुरसुरी धारा,
रोमावली अठारह भारा।।

रविदास जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच।
नर कूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच।।

Guru Ravidas ke Dohe

रैदास कहै जाकै हृदै, रहे रैन दिन राम।
सो भगता भगवंत सम, क्रोध न व्यापै काम।।

हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आस।
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास।।

तोडूं न पाती पूजौं न देवा,
सहज समाधि करौं हरि सेवा।।

सिव सनिकादिक अंत न पाया,
खोजत ब्रह्मा जनम गवाया।।

रहिमन निज संपति बिना, कोउ न बिपति सहाय।
बिनु पानी ज्‍यों जलज को, नहिं रवि सकै बचाय।।

कह रविदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।।

रविदास के दोहे 2020 | Sant Ravidas ke dohe in hindi
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

To Top