प्रकृति पर कविता हिंदी में – Hindi Poem On Nature For Class 8

प्रकृति पर कविता हिंदी में

Prakrati Par Kavita Hindi Me – हिंदी पोएम ऑन नेचर फॉर क्लास ८ : प्रकृति हमारे जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है और प्रकृति का कोई रूप या आकर नहीं होता प्रकृति हमें भगवान के द्वारा दिया हुआ वह उपहार है जिसकी मदद से हमें कई ऐसी चीज़े है जो की मुफ्त में मिल जाती इसीलिए कई महान लोगो द्वारा प्रकृति के ऊपर कुछ कविताये भी लिखी जाती है | यह कविताये आपको प्रेरणा देती है जिसकी मदद से आप प्रकृति के बारे में जान सकते है इसीलिए हम आपको नेचर के ऊपर कुछ बेहतरीन कविताये व पोएम के बारे में बताते है जिन्हे आप अपने दोस्तों के साथ शेयर भी कर सकते है |

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प्रकृति की सुन्दरता पर कविता | प्रकृति के सौंदर्य पर कविता

हे भगवान् तेरी बनाई यह धरती , कितनी ही सुन्दर
नए – नए और तरह – तरह के
एक नही कितने ही अनेक रंग !
कोई गुलाबी कहता ,
तो कोई बैंगनी , तो कोई लाल
तपती गर्मी मैं
हे भगवान् , तुम्हारा चन्दन जैसे व्रिक्स
सीतल हवा बहाते
खुशी के त्यौहार पर
पूजा के वक़्त पर
हे भगवान् , तुम्हारा पीपल ही
तुम्हारा रूप बनता
तुम्हारे ही रंगो भरे पंछी
नील अम्बर को सुनेहरा बनाते
तेरे चौपाये किसान के साथी बनते
हे भगवान् तुम्हारी यह धरी बड़ी ही मीठी

ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे
ये हवाओ की सरसराहट
ये पेड़ो पर फुदकते चिड़ियों की चहचहाहट
ये समुन्दर की लहरों का शोर
ये बारिश में नाचते सुंदर मोर
कुछ कहना चाहती है हमसे
ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे
ये खुबसूरत चांदनी रात
ये तारों की झिलमिलाती बरसात
ये खिले हुए सुन्दर रंगबिरंगे फूल
ये उड़ते हुए धुल
कुछ कहना चाहती है हमसे
ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे
ये नदियों की कलकल
ये मौसम की हलचल
ये पर्वत की चोटियाँ
ये झींगुर की सीटियाँ
कुछ कहना चाहती है हमसे
ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे

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प्रकृति की रक्षा Par Kavita

धरती माँ कर रही है पुकार ।
पेङ लगाओ यहाँ भरमार ।।
वर्षा के होयेंगे तब अरमान ।
अन्न पैदा होगा भरमार ।।
खूशहाली आयेगी देश में ।
किसान हल चलायेगा खेत में ।।
वृक्ष लगाओ वृक्ष बचाओ ।
हरियाली लाओ देश में ।।
सभी अपने-अपने दिल में सोच लो ।
सभी दस-दस वृक्ष खेत में रोप दो ।।
बारिस होगी फिर तेज ।
मरू प्रदेश का फिर बदलेगा वेश ।।
रेत के धोरे मिट जायेंगे ।
हरियाली राजस्थान मे दिखायेंगे ।।
दुनियां देख करेगी विचार ।
राजस्थान पानी से होगा रिचार्ज ।।
पानी की कमी नही आयेगी ।
धरती माँ फसल खूब सिंचायेगी ।।
खाने को होगा अन्न ।
किसान हो जायेगा धन्य ।।
एक बार फिर कहता है मेरा मन ।
हम सब धरती माँ को पेङ लगाकर करते है टनाटन ।।
“जय धरती माँ”

जय भारत माँ
जय गंगा माँ
जय नारी माँ
जय गौ माँ ।।
माँ तुम्हारा ये प्यार है
हम लोगो का संस्कार है ।।
माँ तुम्हारा जो आशीर्वाद है
हमारे दिल मे आपका वास है ।।
माँ हमारे दिल की धङकन मे
तुम्हारे जीवन की तस्वीर है ।।
माँ हम तुम्हे अवश्य बचायेंगे
माँ तुम्हारे दूघ की ताकत को
दुनिया को दिखलायेंगे ।।
हम भारत माँ के वीर है
हम नारी माँ के पूत है
हम गौ माँ के सपूत है
हम गंगा माँ के दूत है ।।
हमने लाल दूध पिया है नारी माँ का
हमने पीला दूध पिया है गौ माँ का
हमने सफेद दूध पिया है गंगा माँ का
हमने हरा दूध पिया है भारत माँ का ।।
इस दूध की ताकत का अंदाज नही
दुश्मन की छाती को फाङे
हम पर ये अहसान नही
हमने लाल दूध पिया है नारी माँ का ।।

Hindi Poem On Nature For Class 8

प्रकृति पर कविता By Famous Poets

लो आ गया फिर से हँसी मौसम बसंत का
शुरुआत है बस ये निष्ठुर जाड़े के अंत का
गर्मी तो अभी दूर है वर्षा ना आएगी
फूलों की महक हर दिशा में फ़ैल जाएगी
पेड़ों में नई पत्तियाँ इठला के फूटेंगी
प्रेम की खातिर सभी सीमाएं टूटेंगी
सरसों के पीले खेत ऐसे लहलहाएंगे
सुख के पल जैसे अब कहीं ना जाएंगे
आकाश में उड़ती हुई पतंग ये कहे
डोरी से मेरा मेल है आदि अनंत का
लो आ गया फिर से हँसी मौसम बसंत का
शुरुआत है बस ये निष्ठुर जाड़े के अंत का
ज्ञान की देवी को भी मौसम है ये पसंद
वातवरण में गूंजते है उनकी स्तुति के छंद
स्वर गूंजता है जब मधुर वीणा की तान का
भाग्य ही खुल जाता है हर इक इंसान का
माता के श्वेत वस्त्र यही तो कामना करें
विश्व में इस ऋतु के जैसी सुख शांति रहे
जिसपे भी हो जाए माँ सरस्वती की कृपा
चेहरे पे ओज आ जाता है जैसे एक संत का
लो आ गया फिर से हँसी मौसम बसंत का
शुरुआत है बस ये निष्ठुर जाड़े के अंत का

नदियों के बहाव को रोका और उन पर बाँध बना डाले
जगह जगह बहती धाराएँ अब बन के रह गई हैं गंदे नाले
जब धाराएँ सुकड़ गई तो उन सब की धरती कब्जा ली
सीनों पर फ़िर भवन बन गए छोड़ा नहीं कुछ भी खाली
अच्छी वर्षा जब भी होती हैं पानी बाँधो से छोड़ा जाता है
वो ही तो फ़िर धारा के सीनों पर भवनों में घुस जाता हैं
इसे प्राकृतिक आपदा कहकर सब बाढ़ बाढ़ चिल्लाते हैं
मीडिया अफसर नेता मिलकर तब रोटियां खूब पकाते हैं

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प्रकृति प्रेम पर कविता | प्रकृति पर आधारित कविता

ह्बायों के रुख से लगता है कि रुखसत हो जाएगी बरसात
बेदर्द समां बदलेगा और आँखों से थम जाएगी बरसात .
अब जब थम गयी हैं बरसात तो किसान तरसा पानी को
बो वैठा हैं इसी आस मे कि अब कब आएगी बरसात .
दिल की बगिया को इस मोसम से कोई नहीं रही आस
आजाओ तुम इस बे रूखे मोसम में बन के बरसात .
चांदनी चादर बन ढक लेती हैं जब गलतफेहमियां हर रात
तब सुबह नई किरणों से फिर होती हें खुसिओं की बरसात .
सुबह की पहली किरण जब छू लेती हें तेरी बंद पलकें
चारों तरफ कलिओं से तेरी खुशबू की हो जाती बरसात .
नहा धो कर चमक जाती हर चोटी धोलाधार की
जब पश्चिम से बादल गरजते चमकते बनते बरसात

क्यूँ मायूस हो तुम टूटे दरख़्त
क्या हुआ जो तुम्हारी टहनियों में पत्ते नहीं
क्यूँ मन मलीन है तुम्हारा कि
बहारों में नहीं लगते फूल तुम पर
क्यूँ वर्षा ऋतु की बाट जोहते हो
क्यूँ भींग जाने को वृष्टि की कामना करते हो
भूलकर निज पीड़ा देखो उस शहीद को
तजा जिसने प्राण, अपनो की रक्षा को
कब खुद के श्वास बिसरने का
उसने शोक मनाया है
सहेजने को औरों की मुस्कान
अपना शीश गवाया है
क्या हुआ जो नहीं हैं गुंजायमान तुम्हारी शाखें
चिडियों के कलरव से
चीड़ डालो खुद को और बना लेने दो
किसी ग़रीब को अपनी छत
या फिर ले लो निर्वाण किसी मिट्टी के चूल्‍हे में
और पा लो मोक्ष उन भूखे अधरों की मुस्कान में
नहीं हो मायूस जो तुम हो टूटे दरख़्त……

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Prakriti Par Kavita Bachon Ke Liye

हे ईस्वर तेरी बनाई यह धरती , कितनी ही सुन्दर
नए – नए और तरह – तरह के
एक नही कितने ही अनेक रंग !
कोई गुलाबी कहता ,
तो कोई बैंगनी , तो कोई लाल
तपती गर्मी मैं
हे ईस्वर , तुम्हारा चन्दन जैसे व्रिक्स
सीतल हवा बहाते
खुशी के त्यौहार पर
पूजा के वक़्त पर
हे ईस्वर , तुम्हारा पीपल ही
तुम्हारा रूप बनता
तुम्हारे ही रंगो भरे पंछी
नील अम्बर को सुनेहरा बनाते
तेरे चौपाये किसान के साथी बनते
हे ईस्वर तुम्हारी यह धरी बड़ी ही मीठी

बाग़ में खुशबू फैल गई , बगिया सारी महक गयी,
रंग-बिरंगे फूल खिले, तितलियाँ चकरा गईं,
लाल ,पीले ,सफ़ेद गुलाब ,गेंदा , जूही ,खिले लाजवाब ,
नई पंखुरियां जाग गयी, बंद कलियाँ झांक रही .
चम्पा , चमेली , सूर्यमुखी , सुखद पवन गीत सुना रही
महकते फूलों की क्यारी , सब के मन को लुभा रही,
धीरे से छू कर देखो खुशबू , तुम पर खुश्बू लुटा रही,
महकते फूलों की डाली, मन ही मन इतरा रही ,
हौले -हौले पाँव धरो, भंवरों की गुंजार बड़ी,
ओस की बूंदे चमक रहीं , पंखुरिया हीरों सी जड़ी,
सब को सजाते महकते फूल , सब को रिझाते महकते फूल,
महकते फूलों से सजे द्वार ,महकते फूल बनते उपहार …………

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