मशहूर शायर सलीम कौसर की शायरी – शेर व ग़ज़लें

Saleem Kausar Shayari

Mashhoor Shayar Saleem Kausar Ki Shayari – Sher Va Ghazale : मशहूर शायर सलीम कौसर जी पाकिस्तान के प्रसिद्द शायरों में से एक है जिन्होंने अपने जीवन में कई शेर व शायरियां लिखी है इनकी गजले आज भी लोगो के लिए प्रेरणादायक बनी हुई है | सलीम कौशर जी का जन्म अगस्त 1947 में हुआ था इन्होने कई हिंदी मूवी के लिए भी गीत लिखे है इनके बहुप्रसिद्ध गजल “मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है” बहुत ही ज्यादा प्रसिद्ध है इसीलिए हम आपको सलीम कौसर जी द्वारा लिखे गए कुछ महान शेरो-शायरी बताते है जो की आप पढ़ सकते है |

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Saleem Kausar Shayari

सलीम कौसर शायरी : नीचे बताई गयी जानकारी में हमने आपको सलीम कौसर जी द्वारा कहे गए शेर बताये है इसके अलावा आप मशहूर शायरों के शेर, प्रसिद्ध शायरों की शायरी तथा शायर और शायरी जानना चाहते है तो हमारी वेबसाइट के माध्यम जान सकते है :

दस्त-ए-दुआ को कासा-ए-साइल समझते हो
तुम दोस्त हो तो क्यूँ नहीं मुश्किल समझते हो

ख़ामोश सही मरकज़ी किरदार तो हम थे
फिर कैसे भला तेरी कहानी से निकलते

जो मिरी रियाज़त-ए-नीम-शब को ‘सलीम’ सुब्ह न मिल सकी
तो फिर इस के मअ’नी तो ये हुए कि यहाँ ख़ुदा कोई और है

वक़्त रुक रुक के जिन्हें देखता रहता है ‘सलीम’
ये कभी वक़्त की रफ़्तार हुआ करते थे

रात को रात ही इस बार कहा है हम ने
हम ने इस बार भी तौहीन-ए-अदालत नहीं की

ये लोग इश्क़ में सच्चे नहीं हैं वर्ना हिज्र
न इब्तिदा न कहीं इंतिहा में आता है

मोहब्बत अपने लिए जिन को मुंतख़ब कर ले
वो लोग मर के भी मरते नहीं मोहब्बत में

जुदाई भी न होती ज़िंदगी भी सहल हो जाती
जो हम इक दूसरे से मसअला तब्दील कर लेते

याद का ज़ख़्म भी हम तुझ को नहीं दे सकते
देख किस आलम-ए-ग़ुर्बत में मिले हैं तुझ से

क़दमों में साए की तरह रौंदे गए हैं हम
हम से ज़ियादा तेरा तलबगार कौन है

ये आग लगने से पहले की बाज़-गश्त है जो
बुझाने वालों को अब तक धुआँ बुलाता है

कैसे हंगामा-ए-फ़ुर्सत में मिले हैं तुझ से
हम भरे शहर की ख़ल्वत में मिले हैं तुझ से

इंतिज़ार और दस्तकों के दरमियाँ कटती है उम्र
इतनी आसानी से तो बाब-ए-हुनर खुलता नहीं

देखते कुछ हैं दिखाते हमें कुछ हैं कि यहाँ
कोई रिश्ता ही नहीं ख़्वाब का ताबीर के साथ

भला वो हुस्न किस की दस्तरस में आ सका है
कि सारी उम्र भी लिक्खें मक़ाला कम रहेगा

कभी इश्क़ करो और फिर देखो इस आग में जलते रहने से
कभी दिल पर आँच नहीं आती कभी रंग ख़राब नहीं होता

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Saleem Kausar Main Khayal Hoon

मैं ख्याल हूँ किसी और का मशहूर शायरी पाकिस्तानी शायरी है जो की सलीम कौसल जी द्वारा कही गयी है इसके अलावा आप भारत के एक प्रसिद्ध शायर द्वारा कहे गए कुछ प्रसिद्ध शायरों के नाम भी जान सकते है :

और इस से पहले कि साबित हो जुर्म-ए-ख़ामोशी
हम अपनी राय का इज़हार करना चाहते हैं

साए गली में जागते रहते हैं रात भर
तन्हाइयों की ओट से झाँका न कर मुझे

साँस लेने से भी भरता नहीं सीने का ख़ला
जाने क्या शय है जो बे-दख़्ल हुई है मुझ में

क़ुर्बतें होते हुए भी फ़ासलों में क़ैद हैं
कितनी आज़ादी से हम अपनी हदों में क़ैद हैं

मैं किसी के दस्त-ए-तलब में हूँ तो किसी के हर्फ़-ए-दुआ में हूँ
मैं नसीब हूँ किसी और का मुझे माँगता कोई और है

कहानी लिखते हुए दास्ताँ सुनाते हुए
वो सो गया है मुझे ख़्वाब से जगाते हुए

क्या अजब कार-ए-तहय्युर है सुपुर्द-ए-नार-ए-इश्क़
घर में जो था बच गया और जो नहीं था जल गया

अजनबी हैरान मत होना कि दर खुलता नहीं
जो यहाँ आबाद हैं उन पर भी घर खुलता नहीं

मैं जानता हूँ मकीनों की ख़ामुशी का सबब
मकाँ से पहले दर-ओ-बाम से मिला हूँ मैं

एक तरफ़ तिरे हुस्न की हैरत एक तरफ़ दुनिया
और दुनिया में देर तलक ठहरा नहीं जा सकता

आईना ख़ुद भी सँवरता था हमारी ख़ातिर
हम तिरे वास्ते तय्यार हुआ करते थे

वो जिन के नक़्श-ए-क़दम देखने में आते हैं
अब ऐसे लोग तो कम देखने में आते हैं

तुझे दुश्मनों की ख़बर न थी मुझे दोस्तों का पता नहीं
तिरी दास्ताँ कोई और थी मिरा वाक़िआ कोई और है

पुकारते हैं उन्हें साहिलों के सन्नाटे
जो लोग डूब गए कश्तियाँ बनाते हुए

मिरी रौशनी तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से मुख़्तलिफ़ तो नहीं मगर
तू क़रीब आ तुझे देख लूँ तू वही है या कोई और है

कुछ इस तरह से वो शामिल हुआ कहानी में
कि इस के बाद जो किरदार था फ़साना हुआ

मशहूर शायर सलीम कौसर की शायरी - शेर व ग़ज़लें

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Saleem Kausar Ghazals

बहुत दिनों में कहीं हिज्र-ए-माह-ओ-साल के बाद
रुका हुआ है ज़माना तिरे विसाल के बाद

ऐ मिरे चारागर तिरे बस में नहीं मोआमला
सूरत-ए-हाल के लिए वाक़िफ़-ए-हाल चाहिए

तमाम उम्र सितारे तलाश करता फिरा
पलट के देखा तो महताब मेरे सामने था

दुनिया अच्छी भी नहीं लगती हम ऐसों को ‘सलीम’
और दुनिया से किनारा भी नहीं हो सकता

‘सलीम’ अब तक किसी को बद-दुआ दी तो नहीं लेकिन
हमेशा ख़ुश रहे जिस ने हमारा दिल दुखाया है

अब जो लहर है पल भर बाद नहीं होगी यानी
इक दरिया में दूसरी बार उतरा नहीं जा सकता

तुम ने सच बोलने की जुरअत की
ये भी तौहीन है अदालत की

तू ने देखा नहीं इक शख़्स के जाने से ‘सलीम’
इस भरे शहर की जो शक्ल हुई है मुझ में

अहल-ए-ख़िरद को आज भी अपने यक़ीन के लिए
जिस की मिसाल ही नहीं उस की मिसाल चाहिए

मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है
सर-ए-आईना मिरा अक्स है पस-ए-आईना कोई और है

मुझे सँभालने में इतनी एहतियात न कर
बिखर न जाऊँ कहीं मैं तिरी हिफ़ाज़त में

हम ने तो ख़ुद से इंतिक़ाम लिया
तुम ने क्या सोच कर मोहब्बत की

तुम तो कहते थे कि सब क़ैदी रिहाई पा गए
फिर पस-ए-दीवार-ए-ज़िंदाँ रात-भर रोता है कौन

अभी हैरत ज़ियादा और उजाला कम रहेगा
ग़ज़ल में अब के भी तेरा हवाला कम रहेगा

ज़ोरों पे ‘सलीम’ अब के है नफ़रत का बहाव
जो बच के निकल आएगा तैराक वही है

मैंने जो लिख दिया वो ख़ुद है गवाही अपनी
जो नहीं लिक्खा अभी उस की बशारत दूँगा

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