अंतरराष्ट्रीय श्रम दिवस कामकाजी पुरुषों और महिलाओं के योगदान को सम्मानित करने के लिए मनाया जाता है। यह मई के महीने में पहले दिन मनाया जाता है और मई दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत में, अवकाश को अंर्तराष्ट्रिय श्रम दिवस, उझिपालार दिनम (तमिल) या कामगर दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। मजदूर दिवस 2019 का विषय ‘सामाजिक और आर्थिक उन्नति के लिए कामगार मजदूरों’ है।

मजदूर दिवस का इतिहास 1 मई, 1886 का है। इस दिन, संयुक्त राज्य अमेरिका में मजदूर संघों ने इस मांग के साथ हड़ताल पर जाने का फैसला किया कि श्रमिकों को दिन में 8 घंटे से अधिक काम करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। 4 मई को शिकागो के हेमार्केट स्क्वायर में एक बम विस्फोट के बाद हड़ताल हुई, जिसके कारण कई नागरिकों और पुलिस अधिकारियों की मृत्यु हो गई।

Majdoor Diwas Par Kavita

मैं मजदूर हूँ ।
किस्मत से मजबूर हूँ ।

सपनों के आसमान में जीता हूँ,
उम्मीदों के आँगन को सींचता हूँ ।
दो वक्त की रोटी खानें के लिये,
अपने स्वभिमान को नहीँ बेचता हूँ ।

तन को ढकने के लिये
फटा पुराना लिबास है ।
कंधों पर जिम्मेदारीहै
जिसका मुझे अहसास है ।

खुला आकाश है छत मेरा
बिछौना मेरा धरती है ।
घास-फूस के झोपड़ी में
सिमटी अपनी हस्ती है ।

गुजर रहा जीवन अभावों में,
जो दिख रहा प्रत्यक्ष है ।
आत्मसंतोष ही मेरे
जीवन का लक्ष्य है ।

गरीबी और लाचारी से जूझ
जूझकर हँसना भूल चुका हूँ ।

अनगिनत तनावों से लदा हुआ,
आँसू पीकर मजबूत बना हूँ।

दुनिया जगर-मगर है कि मज़दूर दिवस है
चर्चा इधर-उधर है कि मज़दूर दिवस है

मालिक तो फ़ायदे की क़वायद में लगे हैं
उन पर नहीं असर है कि मज़दूर दिवस है

ऐलान तो हुआ था कि घर इनको मिलेंगे
अब भी अगर-मगर है कि मज़दूर दिवस है

साधन नहीं है कोई भी, भरने हैं कई पेट
इक टोकरी है, सर है कि मज़दूर दिवस है

हाथों में फावड़े हैं ‘यती’ रोज़ की तरह
उनको कहाँ ख़बर है कि मज़दूर दिवस है

जिसके कंधो पर बोझ बढ़ा
वो भारत माँ का बेटा कौन
जिसने पसीने से भूमि को सींचा
वो भारत माँ का बेटा कौन
वह किसी का गुलाम नहीं
अपने दम पर जीता हैं
सफलता एक एक कण ही सही
लेकिन है अनमोल जो मज़दूर कहलाता हैं

International Labour Day Poem In Hindi

मैं एक मजदूर हूँ
भगवान की आंखों से मैं दूर हूँ
छत खुला आकाश है
हो रहा वज्रपात है
फिर भी नित दिन मैं
गाता राम धुन हूं
गुरु हथौड़ा हाथ में
कर रहा प्रहार है
सामने पड़ा हुआ
बच्चा कराह रहा है
फिर भी अपने में मगन
कर्म में तल्लीन हूँ
मैं एक मजदूर हूँ
भगवान की आंखों से मैं दूर हूँ ।
आत्मसंतोष को मैंने
जीवन का लक्ष्य बनाया
चिथड़े-फटे कपड़ों में
सूट पहनने का सुख पाया
मानवता जीवन को
सुख-दुख का संगीत है
मैं एक मजदूर हूँ
भगवान की आंखों से मैं दूर हूँ ।

मैं मजदूर हूँ,
तोड़ता हूँ पत्थर,
ढोता हूँ गरीबी का बोझ,
जिंदगी भर अपने कंधो पर,
न जाने कितने लोग,
आसमा सी ऊंचाई छू गए,
मेरे भूखे पेट पर पैर रखकर,
लेकिन,
मैं लुढकता ही रहा,
लुभावने वादों की फर्श पर,
याद है…..पिछले साल….
जब खुला था शहर में,
बड़ा सा सरकारी अस्पताल…
तब मैं रो रहा था..
अपने मासूम बेटे की लाश पर,
सर रखकर………………….
फटी धोती में लिपटी मेरी बीवी,
अनाथ से दीखते मेरे शेष बच्चे…
क्या यही है नियति मेरी?
क्या यूँ ही तड़पता रहूँगा मै?
जिंदगी भर…….

Labour Day Poem In Urdu

ہم مزدور ہیں، مجبور نہیں ہیں

ہاتھ میں بیرون ملک آمدنی پر چلتا ہے
بیگ میں کچھ گر، خم، آلو اور پسان …
کچھ ارمان ذہن میں ٹوٹے ہوئے موزے، ٹوٹے ہوئے پاجاما
جس مقصد کے لئے دستیاب ہے اس میں کیا پایا جا سکتا ہے.

سعودی عوام کو کل پھر کوتی میں جانا ہوگا
یہ محتاط نہیں ہے ابھی تک، یہ بھوک کو ختم کرنا ہے …
دو اینٹوں پر، موٹی روٹی بیک رہی ہے
گیلے لکڑی خشک آنسو اب بھی بیکنگ ہے ..

تمباکو نوشی کو دیکھ کر، قبر کی کتے نے دم کو ہلاتا ہے
انہوں نے سوچا کہ وہ کیمپ کے قریب ایک ٹکڑا ملے گا …
وہ کام کرنے والے لوگوں کی سلامتی کر رہا ہے
بھوک میں آلو پکایا آلو پکایا جاتا ہے.

ہالی اور دیویالی اس کے خون آتے ہیں
خاندان کے گھر کی نظر بہت روٹی ہے …
ماننا طفی نہیں پوچھا، گڑیا غائب ہے
صاحب پوپوں کو دیکھ کر لوگوں کا دماغ گھیر لیتے ہیں ..

اما کے سالور کاٹا دوبارہ ڈاڈا
مجھے نہیں پتہ کہ اختلافات دونوں میں کیا ہوا ہے …
گھر یا اس طرح کے ایک غریب شخص میں ایک گہری کنسٹر تھا
کل سے کم سے کم اس کے منہ میں یہ نہیں کیا گیا ہے ..

گڑیا کی ماں نے اس کو چھیڑ لیا ہے
دونوں معاملات میں اختلافات ہوتے ہیں …

دو اینٹوں پر، موٹی روٹی بیک رہی ہے
گیلے لکڑی خشک آنسو اب بھی بیکنگ ہے ..

Labour Day Poem In English

मजदूर हैं हम, मजबूर नहीं

चलता है परदेश कमाने हाथ में थैला तान
थैले में कुछ चना, चबेना, आलू और पिसान…
टूटी चप्‍पल, फटा पजामा मन में कुछ अरमान
ढंग की जो मिल जाये मजूरी तो मिल जाये जहान।।

साहब लोगों की कोठी पर कल फिर उसको जाना है
तवा नहीं है फिर भी उसको तन की भूख मिटाना है…
दो ईटों पर धरे फावड़ा रोटी सेंक रहा है
गीली लकड़ी सूखे आंसू फिर भी सेंक रहा है।।

धुंआ देखकर कबरा कुत्‍ता पूंछ हिलाता आया
सोचा उसने मिलेगा टुकड़ा, डेरा पास जमाया…
मेहनतकश इंसानों का वह सालन बना रहा है
टेढ़ी मेढ़ी बटलोई में आलू पका रहा है।।

होली और दिवाली आकर उसका खून सुखाती है
घर परिवार की देख के हालत खूब रूलाई आती है…
मुन्‍ना टाफी नहीं मांगता, गुड़िया गुमसुम रहती है
साहब लोगों के पिल्‍लों को देख के मन भरमाती है।।

फट गया कुरता फिर दादा का, अम्‍मा की सलवार
पता नहीं किस बात पे हो गई दोनों में तकरार…
थे अधभरे कनस्‍तर घर में थी ना ऐसी कंगाली
नहीं गयी है मुंह में उसके कल से एक निवाली।।

लगता गुड़िया की मम्‍मी ने छेड़ी है कोई रार
इसी बात पर हो गई होगी दोनों में तकरार…

दो ईटों पर धरे फावड़ा रोटी सेंक रहा है
गीली लकड़ी सूखे आंसू फिर भी सेंक रहा है।।

Labour Day Poem In Punjabi

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ਅਸੀਂ ਮਜਦੂਰ ਹਾਂ, ਮਜਬੂਰ ਨਹੀਂ ਹਾਂ

ਵਿਦੇਸ਼ੀ ਹੱਥਾਂ ਵਿੱਚ ਬੈਗ ਬੈਗ ਚੱਲਦਾ ਹੈ
ਬੈਗ ਵਿਚ ਕੁਝ ਗ੍ਰਾਮ, ਕਰੀ, ਆਲੂ ਅਤੇ ਪਿਸਨ …
ਟੁੱਟੇ ਹੋਏ ਚੱਪਲਾਂ, ਕੁਝ ਪੱਕੇ ਰਕਮਾਂ ਨੂੰ ਪੱਕਾ ਕਰਨ ਲਈ ਕੁਝ ਅਰਮਾਨ
ਇਸ ਉਦੇਸ਼ ਲਈ ਕੀ ਉਪਾਅ ਲੱਭਿਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ?

ਸਾਹਬ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਕੋਠੀ ਮੁੜ ਜਾਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ
ਇਹ ਅਜੇ ਤਾਈ ਤਾਜ਼ਾ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਇਹ ਭੁੱਖ ਨੂੰ ਖਤਮ ਕਰਨਾ ਹੈ …
ਦੋ ਇੱਟਾਂ ਤੇ, ਕਸਬੇ ਪਕਾਉਣਾ ਰੋਟੀ ਹੈ
ਵੈੱਟ ਲੱਕੜੀ ਦੇ ਹੰਝੂ ਅਜੇ ਵੀ ਪਕਾਉਣਾ ਹੈ ..

ਧੂੰਏ ਨੂੰ ਵੇਖਣਾ, ਕਬਰਸਤਾਨ ਦਾ ਪੂਛ ਪੂਛ ਨੂੰ ਹਿਲਾਉਂਦਾ ਹੈ
ਉਸ ਨੇ ਸੋਚਿਆ ਕਿ ਉਸ ਨੂੰ ਕੈਂਪ ਦੇ ਨੇੜੇ ਇੱਕ ਟੁਕੜਾ ਮਿਲੇਗਾ …
ਉਹ ਕੰਮ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਨਮਸਕਾਰ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹੈ
ਬਟਲਰ ਵਿਚ ਆਲੂ ਪਕਾਏ ਜਾਂਦੇ ਹਨ.

ਹੋਲੀ ਅਤੇ ਦੀਵਾਲੀ ਆਉਂਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਇਸਦੇ ਖੂਨ ਨੂੰ ਸੁਕਾਉਂਦੇ ਹਨ
ਪਰਿਵਾਰ ਦਾ ਘਰ ਬਹੁਤ ਨਜ਼ਦੀਕ ਹੈ …
ਮੁੰਨਾ ਟੱਫੀ ਨਹੀਂ ਪੁੱਛਦਾ, ਗੁਲਾਬੀ ਲਾਪਤਾ ਹੈ
ਸਾਹਿਬ ਉਨ੍ਹਾਂ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਮਨ ਗਾਉਂਦਾ ਹੈ ਜੋ ਕਤੂਰਾਂ ਨੂੰ ਵੇਖਦੇ ਹਨ ..

ਕੜਤਾ ਫਿਰ ਦਾਦਾ, ਅੰਮਾ ਦਾ ਸਲਵਾਰ
ਮੈਨੂੰ ਨਹੀਂ ਪਤਾ ਕਿ ਦੋਵੇਂ ਵਿਵਾਦਾਂ ਵਿਚ ਕੀ ਹੋਇਆ …
ਘਰ ਵਿਚ ਇਕ ਡੂੰਘੀ ਡਾਂਸ ਸੀ ਜਾਂ ਅਜਿਹਾ ਗਰੀਬ ਆਦਮੀ
ਇਹ ਇਸ ਦੇ ਕੱਲ੍ਹ ਦੇ ਬਾਅਦ ਤੋਂ ਮੂੰਹ ਵਿੱਚ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ.

ਗੁਜਾਰੇ ਦੀ ਮੰਮੀ ਨੇ ਰਾਰੇ ਨੂੰ ਵਿੰਨ੍ਹਿਆ ਹੈ
ਦੋਵਾਂ ਵਿਵਾਦਾਂ ਵਿਚ ਵੀ ਇਹੀ ਗੱਲ ਹੋ ਸਕਦੀ ਸੀ …

ਦੋ ਇੱਟਾਂ ਤੇ, ਕਸਬੇ ਪਕਾਉਣਾ ਰੋਟੀ ਹੈ
ਵੈੱਟ ਲੱਕੜੀ ਦੇ ਹੰਝੂ ਅਜੇ ਵੀ ਪਕਾਉਣਾ ਹੈ ..

मज़दूर दिवस पर कविता – Labour Day Poem In Hindi
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