शायरी (Shayari)

फ़ानी बदायुनी शायरी इन हिंदी – उर्दू ग़ज़ल व शेर

Fani Badayuni Shayari In Hindi – Urdu Ghazal Va Sher : फानी बदायुनी जी उर्दू जगत के महान कवियों में से एक कवि है इनक जन्म 13 सितम्बर 1879 को बदायूं के इस्लामनगर में हुआ था इनका पूरा नाम शौकत अली खान है इनकी मृत्यु 82 साल की उम्र में 27 अगस्त 1961 में हुई थी | इन्होने बाक़ियाते फ़ानी (1926), वजदानियात (1940) इनके प्रमुख संग्रह है | इसीलिए हम आपको बदायूंनी जी द्वारा लिखी गयी कुछ महत्वपूर्ण शेरो-शायरियो व ग़ज़लों के बारे में बताते है जिन्हे पढ़ कर आप इनके बारे में काफी कुछ जान सकते है |

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हिन्दी उर्दू ग़ज़ल शेर शायरी

हज़ार ढूँडिए उस का निशाँ नहीं मिलता
जबीं मिले तो मिले आस्ताँ नहीं मिलता

मेरी हवस को ऐश-ए-दो-आलम भी था क़ुबूल
तेरा करम कि तू ने दिया दिल दुखा हुआ

मुझ तक उस महफ़िल में फिर जाम-ए-शराब आने को है
उम्र-ए-रफ़्ता पलटी आती है शबाब आने को है

हर नफ़स उम्र-ए-गुज़िश्ता की है मय्यत ‘फ़ानी’
ज़िंदगी नाम है मर मर के जिए जाने का

सुने जाते न थे तुम से मिरे दिन-रात के शिकवे
कफ़न सरकाओ मेरी बे-ज़बानी देखते जाओ

सूर-ओ-मंसूर-ओ-तूर अरे तौबा
एक है तेरी बात का अंदाज़

हिज्र में मुस्कुराए जा दिल में उसे तलाश कर
नाज़-ए-सितम उठाए जा राज़-ए-सितम न फ़ाश कर

हर मुसीबत का दिया एक तबस्सुम से जवाब
इस तरह गर्दिश-ए-दौराँ को रुलाया मैं ने

हर नफ़स उम्र-ए-गुज़िश्ता की है मय्यत ‘फ़ानी’
ज़िंदगी नाम है मर मर के जिए जाने का

होते हैं राज़-ए-इश्क़-ओ-मोहब्बत इसी से फ़ाश
आँखें ज़बाँ नहीं है अगर बे-ज़बाँ नहीं

यूँ न क़ातिल को जब यक़ीं आया
हम ने दिल खोल कर दिखाई चोट

हम हैं उस के ख़याल की तस्वीर
जिस की तस्वीर है ख़याल अपना

यूँ चुराईं उस ने आँखें सादगी तो देखिए
बज़्म में गोया मिरी जानिब इशारा कर दिया

मौत का इंतिज़ार बाक़ी है
आप का इंतिज़ार था न रहा

मेरे जुनूँ को ज़ुल्फ़ के साए से दूर रख
रस्ते में छाँव पा के मुसाफ़िर ठहर न जाए

तुम्हीं कहो कि तुम्हें अपना समझ के क्या पाया
मगर यही कि जो अपने थे सब पराए हुए

मर के टूटा है कहीं सिलसिला-ए-क़ैद-ए-हयात
मगर इतना है कि ज़ंजीर बदल जाती है

यूँ न किसी तरह कटी जब मिरी ज़िंदगी की रात
छेड़ के दास्तान-ए-ग़म दिल ने मुझे सुला दिया

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Fani Badayuni Ghazal

रोज़-ए-जज़ा गिला तो क्या शुक्र-ए-सितम ही बन पड़ा
हाए कि दिल के दर्द ने दर्द को दिल बना दिया

रूह अरबाब-ए-मोहब्बत की लरज़ जाती है
तू पशेमान न हो अपनी जफ़ा याद न कर

या तिरे मुहताज हैं ऐ ख़ून-ए-दिल
या इन्हीं आँखों से दरिया भर गए

यारब नवा-ए-दिल से ये कान आश्ना से हैं
आवाज़ आ ही है ये कब की सुनी हुई

या-रब तिरी रहमत से मायूस नहीं ‘फ़ानी’
लेकिन तिरी रहमत की ताख़ीर को क्या कहिए

वो सुब्ह-ए-ईद का मंज़र तिरे तसव्वुर में
वो दिल में आ के अदा तेरे मुस्कुराने की

मौजों की सियासत से मायूस न हो ‘फ़ानी’
गिर्दाब की हर तह में साहिल नज़र आता है

फिर किसी की याद ने तड़पा दिया
फिर कलेजा थाम कर हम रह गए

दिल का उजड़ना सहल सही बसना सहल नहीं ज़ालिम
बस्ती बसना खेल नहीं बसते बसते बस्ती है

तर्क-ए-उम्मीद बस की बात नहीं
वर्ना उम्मीद कब बर आई है

तिनकों से खेलते ही रहे आशियाँ में हम
आया भी और गया भी ज़माना बहार का

मौत आने तक न आए अब जो आए हो तो हाए
ज़िंदगी मुश्किल ही थी मरना भी मुश्किल हो गया

या कहते थे कुछ कहते जब उस ने कहा कहिए
तो चुप हैं कि क्या कहिए खुलती है ज़बाँ कोई

रोने के भी आदाब हुआ करते हैं ‘फ़ानी’
ये उस की गली है तेरा ग़म-ख़ाना नहीं है

रोज़ है दर्द-ए-मोहब्बत का निराला अंदाज़
रोज़ दिल में तिरी तस्वीर बदल जाती है

सुने जाते न थे तुम से मिरे दिन रात के शिकवे
कफ़न सरकाओ मेरी बे-ज़बानी देखते जाओ

वो नज़र कामयाब हो के रही
दिल की बस्ती ख़राब हो के रही

रूह घबराई हुई फिरती है मेरी लाश पर
क्या जनाज़े पर मेरे ख़त का जवाब आने को है

फ़ानी बदायुनी शायरी इन हिंदी - उर्दू ग़ज़ल व शेर

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Fani Badayuni Poetry Urdu

शिकवा-ए-हिज्र पे सर काट के फ़रमाते हैं
फिर करोगे कभी इस मुँह से शिकायत मेरी

मुझे बुला के यहाँ आप छुप गया कोई
वो मेहमाँ हूँ जिसे मेज़बाँ नहीं मिलता

ना-उमीदी मौत से कहती है अपना काम कर
आस कहती है ठहर ख़त का जवाब आने को है

फ़ानी दवा-ए-दर्द-ए-जिगर ज़हर तो नहीं
क्यूँ हाथ काँपता है मिरे चारासाज़ का

जौर को जौर भी अब क्या कहिए
ख़ुद वो तड़पा के तड़प जाते हैं

नहीं ज़रूर कि मर जाएँ जाँ-निसार तेरे
यही है मौत कि जीना हराम हो जाए

मैं ने ‘फ़ानी’ डूबती देखी है नब्ज़-ए-काएनात
जब मिज़ाज-ए-यार कुछ बरहम नज़र आया मुझे

न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मालूम
रहा ये वहम कि हम हैं सो वो भी क्या मालूम

मुस्कुराए वो हाल-ए-दिल सुन कर
और गोया जवाब था ही नहीं

न इंतिहा की ख़बर है न इंतिहा मालूम
रहा ये वहम कि हम हैं सो ये भी क्या मालूम

दुनिया मेरी बला जाने महँगी है या सस्ती है
मौत मिले तो मुफ़्त न लूँ हस्ती की क्या हस्ती है

दुनिया-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ में किस का ज़ुहूर था
हर आँख बर्क़-पाश थी हर ज़र्रा तूर था

जीने भी नहीं देते मरने भी नहीं देते
क्या तुम ने मोहब्बत की हर रस्म उठा डाली

जिस्म-ए-आज़ादी में फूंकी तू ने मजबूरी की रूह
ख़ैर जो चाहा किया अब ये बता हम क्या करें

ना-मेहरबानियों का गिला तुम से क्या करें
हम भी कुछ अपने हाल पे अब मेहरबाँ नहीं

दिल सरापा दर्द था वो इब्तिदा-ए-इश्क़ थी
इंतिहा ये है कि ‘फ़ानी’ दर्द अब दिल हो गया

दिल-ए-आबाद का ‘फ़ानी’ कोई मफ़्हूम नहीं
हाँ मगर जिस में कोई हसरत-ए-बर्बाद रहे

दिल-ए-मरहूम को ख़ुदा बख़्शे
एक ही ग़म-गुसार था न रहा

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