बुद्ध पूर्णिमा 2020: बुद्ध पूर्णिमा का त्योहार भगवान बुद्ध के जन्म को चिह्नित करने के लिए मनाया जाता है। बुद्ध पूर्णिमा या बुद्ध जयंती को पारंपरिक धार्मिक उत्साह के साथ मनाया जाता है। बुद्ध पूर्णिमा हिंदू माह वैशाख (अप्रैल / मई) में पूर्णिमा के दिन पड़ती है। भगवान बुद्ध का जन्म वैशाख के महीने में पूर्णिमा के दिन 563 ईसा पूर्व में हुआ था। यहाँ यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि बुद्ध ने उसी दिन (पूर्णिमा के दिन) ज्ञान और निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया था। इस प्रकार, बुद्ध पूर्णिमा भी गौतम बुद्ध की पुण्यतिथि है। सारनाथ बौद्ध धर्म में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है क्योंकि गौतम बुद्ध ने सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया था।

Poem on Buddha Purnima in Hindi

“बुद्धं शरणं गच्छामि,
ध्मंबुद् शरणं गच्छाेमि,
संघं शरणं गच्छामि।”
बुद्ध भगवान,
जहाँ था धन, वैभव, ऐश्वछर्य का भंडार,
जहाँ था, पल-पल पर सुख,
जहाँ था पग-पग पर श्रृंगार,
जहाँ रूप, रस, यौवन की थी सदा बहार,
वहाँ पर लेकर जन्म ,
वहाँ पर पल, बढ़, पाकर विकास,
कहाँ से तुम्में् जाग उठा
अपने चारों ओर के संसार पर
संदेह, अविश्वापस?
और अचानक एक दिन
तुमने उठा ही तो लिया
उस कनक-घट का ढक्कगन,
पाया उसे विष-रस भरा।
दुल्हउन की जिसे पहनाई गई थी पोशाक,
वह तो थी सड़ी-गली लाश।
तुम रहे अवाक्,
हुए हैरान,
क्योंै अपने को धोखे में रक्खेा है इंसान,
क्योंै वे पी रहे है विष के घूँट,
जो निकलता है फूट-फूट?
क्याि यही है सुख-साज
कि मनुष्य खुजला रहा है अपनी खाज?
निकल गए तुम दूर देश,
वनों-पर्वतों की ओर,
खोजने उस रोग का कारण,
उस रोग का निदान।
बड़े-बड़े पंडितों को तुमने लिया थाह,
मोटे-मोटे ग्रंथों को लिया अवगाह,
सुखाया जंगलों में तन,
साधा साधना से मन,
सफल हुया श्रम,
सफल हुआ तप,
आया प्रकाश का क्षण,
पाया तुमने ज्ञान शुद्ध,
हो गए प्रबुद्ध।
देने लगे जगह-जगह उपदेश,
जगह-जगह व्यादख्या न,
देखकर तुम्हाजरा दिव्यय वेश,
घेरने लगे तुम्हेंश लोग,
सुनने को नई बात
हमेशा रहता है तैयार इंसान,
कहनेवाला भले ही हो शैतान,
तुम तो थे भगवान।
जीवन है एक चुभा हुआ तीर,
छटपटाता मन, तड़फड़ाता शरीर।
सच्चातई है- सिद्ध करने की जररूरत है?
पीर, पीर, पीर।
तीर को दो पहले निकाल,
किसने किया शर का संधान?-
क्यों किया शर का संधान?
किस किस्मा का है बाण?
ये हैं बाद के सवाल।
तीर को पहले दो निकाल।

“माँ कह एक कहानी।”
“बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?”
“कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी
कह माँ कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी?
माँ कह एक कहानी।”
“तू है हठी, मानधन मेरे, सुन उपवन में बड़े सवेरे,
तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ सुरभि मनमानी।”
“जहाँ सुरभि मनमानी! हाँ माँ यही कहानी।”
“वर्ण वर्ण के फूल खिले थे, झलमल कर हिमबिंदु झिले थे,
हलके झोंके हिले मिले थे, लहराता था पानी।”
“लहराता था पानी, हाँ-हाँ यही कहानी।”
“गाते थे खग कल-कल स्वर से, सहसा एक हंस ऊपर से,
गिरा बिद्ध होकर खग शर से, हुई पक्षी की हानी।”
“हुई पक्षी की हानी? करुणा भरी कहानी!”
“चौंक उन्होंने उसे उठाया, नया जन्म सा उसने पाया,
इतने में आखेटक आया, लक्ष सिद्धि का मानी।”
“लक्ष सिद्धि का मानी! कोमल कठिन कहानी।”
“मांगा उसने आहत पक्षी, तेरे तात किन्तु थे रक्षी,
तब उसने जो था खगभक्षी, हठ करने की ठानी।”
“हठ करने की ठानी! अब बढ़ चली कहानी।”
“हुआ विवाद सदय निर्दय में, उभय आग्रही थे स्वविषय में,
गयी बात तब न्यायालय में, सुनी सभी ने जानी।”
“सुनी सभी ने जानी! व्यापक हुई कहानी।”
“राहुल तू निर्णय कर इसका, न्याय पक्ष लेता है किसका?
कह दे निर्भय जय हो जिसका, सुन लूँ तेरी बानी”
“माँ मेरी क्या बानी? मैं सुन रहा कहानी।
कोई निरपराध को मारे तो क्यों अन्य उसे न उबारे?
रक्षक पर भक्षक को वारे, न्याय दया का दानी।”
“न्याय दया का दानी! तूने गुनी कहानी।”

Buddha Poornima Kavita

यही धर्म है मोक्ष पथगामी
मध्यम मार्ग सरल
पाँच अनुशीलन हैं इसके
मानव पालन कर.
सत्कर्मों की पूँजी बना ले
प्रेम-भाव अविरल
कर्मों को अपना धर्म समझ ले
करना किसी से न छल.
प्राणीमात्र पर दया करना तू
जो हैं दीन-निर्बल
बुद्ध ने जो सन्देश दिया है
उस पर करना अमल.
राग-रंग नहीं करना तुझको
संयम है तेरा बल
मानव जीवन तुझे मिला है
रखना इसे निर्मल.
त्रिपिटक ग्रंथों में समाये
जीवन सार सकल
प्रज्ञा शील करुणा अपना ले
मोक्ष की कामना कर.
स्वर्ग-नर्क सब किसने देखा ?
किसने देखा कल ?
परम-धाम जाना है तुझको
बुद्ध की राह पर चल.
बुद्धं शरणम गच्छामि
धम्मं शरणम गच्छामि
संघम शरणम गच्छामि
पंचशील के अनुगामी.
बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनायें

वेसक बुद्ध कविता मराठी

ग़रज़, कि बंद हो जाएगा दुनिया का सब काम,
सोचो, कि अगर अपनी प्रेयसी से करते हो तुम प्रेमालाप
और पहुँच जाएँ तुम्हागरे अब्बा जान,
तब क्याच होगा तुम्हाीरा हाल।
तबीयत पड़ जाएगी ढीली,
नशा सब हो जाएगा काफ़ूर,
एक दूसरे से हटकर दूर
देखोगे न एक दूसरे का मुँह?
मानवता का बुरा होता हाल
अगर ईश्वार डटा रहता सब जगह, सब काल।
इसने बनवाकर मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर
ख़ुदा को कर दिया है बंद;
ये हैं ख़ुदा के जेल,
जिन्हेंख यह-देखो तो इसका व्यंाग्यल-
कहती है श्रद्धा-पूजा के स्थाइन।
कहती है उनसे,
“आप यहीं करें आराम,
दुनिया जपती है आपका नाम,
मैं मिल जाऊँगी सुबह-शाम,
दिन-रात बहुत रहता है काम।”
अल्लाि पर लगा है ताला,
बंदे करें मनमानी, रँगरेल।
वाह री दुनिया,
तूने ख़ुदा का बनाया है खूब मज़ाक,
खूब खेल।”
जहाँ ख़ुदा की नहीं गली दाल,
वहाँ बुद्ध की क्या चलती चाल,
वे थे मूर्ति के खिलाफ,
इसने उन्हीं की बनाई मूर्ति,
वे थे पूजा के विरुद्ध,
इसने उन्हींक को दिया पूज,
उन्हेंन ईश्वकर में था अविश्वाास,
इसने उन्हींक को कह दिया भगवान,
वे आए थे फैलाने को वैराग्यद,
मिटाने को सिंगार-पटार,
इसने उन्हींि को बना दिया श्रृंगार।
बनाया उनका सुंदर आकार;
उनका बेलमुँड था शीश,
इसने लगाए बाल घूंघरदार;
और मिट्टी,लकड़ी, पत्थंर, लोहा,
ताँबा, पीतल, चाँदी, सोना,
मूँगा, नीलम, पन्नाग, हाथी दाँत-
सबके अंदर उन्हें डाल, तराश, खराद, निकाल
बना दिया उन्हेंू बाज़ार में बिकने का सामान।
पेकिंग से शिकागो तक
कोई नहीं क्यूारियों की दूकान
जहाँ, भले ही और न हो कुछ,
बुद्ध की मूर्ति न मिले जो माँगो।

Buddha Purnima Kavita in Hindi

Buddha Purnima Kavita in Hindi

अविष्कार हुई बुद्ध वाणी भूमध्य सागर के उस पार,
दूर समुन्दर के विस्तृत दृष्टि में, बुद्ध
दर्शन बन गया दिव्य शक्ति का आधार..
बुद्ध पूर्णिमा दिखाया जग को एक नए दिशा,
हिंसा मुक्त पृथ्वी में हुया अविष्कार रचनात्मक गुणों का आधार.
उज्जवलित हुई बुद्ध वाणी कितने ही देशो के मिट्टी में हर बार।
एक सूत्र में गाथI भिन्न देशो के कई मझहबो को,
बुद्ध दर्शन गुथा गया पुष्प माला में, हिंसा मुक्त, दया भाव पृथ्वी पर
एक सूत्र धार.
बुद्ध पूर्णिमा हुया चारो ओर प्रकाशमय,
गूंज उठी हर दिशा में एक सामान।
जन जागरण आया इस धरा में,
बन कर नए सूत्र धार

Hindi Poem on Buddha Purnima

जगत है चलायमान,
बहती नदी के समान,
पार कर जाओ इसे तैरकर,
इस पर बना नहीं सकते घर।
जो कुछ है हमारे भीतर-बाहर,
दीखता-सा दुखकर-सुखकर,
वह है हमारे कर्मों का फल।
कर्म है अटल।
चलो मेरे मार्ग पर अगर,
उससे अलग रहना है भी नहीं कठिन,
उसे वश में करना है सरल।
अंत में, सबका है यह सार-
जीवन दुख ही दुख का है विस्तायर,
दुख की इच्छाद है आधार,
अगर इच्छा् को लो जीत,
पा सकते हो दुखों से निस्ताीर,
पा सकते हो निर्वाण पुनीत।
ध्वसनित-प्रतिध्वतनित
तुम्हाेरी वाणी से हुई आधी ज़मीन-
भारत, ब्रम्हाे, लंका, स्या म,
तिब्बात, मंगोलिया जापान, चीन-
उठ पड़े मठ, पैगोडा, विहार,
जिनमें भिक्षुणी, भिक्षुओं की क़तार
मुँड़ाकर सिर, पीला चीवर धार
करने लगी प्रवेश
करती इस मंत्र का उच्चाार :
“बुद्धं शरणं गच्छाीमि,
ध्मंधं श शरणं गच्छािमि,
संघं शरणं गच्छाछमि।”
कुछ दिन चलता है तेज़
हर नया प्रवाह,
मनुष्य उठा चौंक, हो गया आगाह।
वाह री मानवता,
तू भी करती है कमाल,
आया करें पीर, पैगम्बमर, आचार्य,
महंत, महात्माछ हज़ार,
लाया करें अहदनामे इलहाम,
छाँटा करें अक्लम बघारा करें ज्ञान,
दिया करें प्रवचन, वाज़,
तू एक कान से सुनती,
दूसरे सी देती निकाल,
चलती है अपनी समय-सिद्ध चाल।
जहाँ हैं तेरी बस्तियाँ, तेरे बाज़ार,
तेरे लेन-देन, तेरे कमाई-खर्च के स्था,न,
वहाँ कहाँ हैं
राम, कृष्णँ, बुद्ध, मुहम्मयद, ईसा के
कोई निशान।
इनकी भी अच्छी चलाई बात,
इनकी क्याच बिसात,
इनमें से कोई अवतार,
कोई स्वेर्ग का पूत,
कोई स्वेर्ग का दूत,
ईश्वसर को भी इनसे नहीं रखने दिया हाथ।
इसने समझ लिया था पहले ही
ख़दा साबित होंगे ख़तरनाक,
अल्लासह, वबालेजान, फज़ीहत,
अगर वे रहेंगे मौजूद
हर जगह, हर वक्तह।
झूठ-फरेब, छल-कपट, चोरी,
जारी, दग़ाबाजी, छोना-छोरी, सीनाज़ोरी
कहाँ फिर लेंगी पनाह;

Buddha Purnima Kavita in Marathi

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कभी कभी मै सोचती हूँ
आशा के दीप जलाए
तुम्हे ढूंढ़ रही हूँ
हे -गौतम बुद्ध
तुम …एक भाव
जरुर हो ….
पर पूर्ण कविता नहीं
अपनी ही कैद से भागे
खुले आसमान के नीचे
क्या मिला वहाँ
विचार,एहसास ..अनुभव…
ज्ञान भी …बाँट लेने को
मानती हूँ मिला होगा
बहुत कुछ …..
पर ज्ञान वो नहीं जो
जो तुमने
किताबो में लिख दिया
और हमने पढ़ लिया ||
जन्म लिया था..
तो
कम से कम उसे
भोगते तो
देखते …
कितने उतार चड़ाव
है इस जीवन में
जीवन वो नहीं
जो तुमने जिया
एक पेड़ के नीचे …..
जीवन वो है
जो एक औरत जीती है
अपने परिवार के लिए
माँ,बहन,बेटी और पत्नी
बन के …
जीवन वो है जो
एक भाई जीता है
अपनी बहनों के लिए
उनके सामने एक आदर्श
रखने के लिए
कर देता है खुद की
इच्छायों का बलिदान
एक परिवार को
उनकी ख़ुशी देने
के लिए
जीवन वो है
जहां चार बाते हो
कुछ झगडा
कुछ प्यार हो
पति पत्नी में
मान- मुनहार हो
तकरार हो
जहाँ ..
इधर उधर की
कह लेने से
मन का गुबार
निकल जाता है
जैसे तैसे
हँसते-खेलते
लड़ते-झगड़ते
ये समय भी
खूब गुज़र जाता है
हे -गौतम बुद्ध
अफ़सोस है मुझे
की एक मिले जीवन को
तुमने यूँ ही
व्यर्थ गँवा दिया
देखे नहीं जीवन के सभी रंग
और ज्ञान के शब्दों में
संसार को बहा दिया

बुद्ध पूर्णिमा पर कविता – Buddha Purnima Poem in Hindi
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