कविता (हिंदी लेख)

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर कविता | बेटी पर कविता – Poem On Daughter In Hindi

Beti Bachao Beti Padhao Par Kavita | Beti Par Kavita – पोएम ऑन डॉटर इन हिंदी : इस देश में बेटियों को सबसे अधिक ज्यादा महत्व दिया गया है और हमारे देश में उनका क्या क्या महत्व है ? तथा उनको हमारे देश में इतनी इम्पोर्टेंस क्यों दी जाती है इसके लिए हमारे देश की सरकार समय-2 पर नए-2 अभियान चलाती रहती है जैसे की ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ इसमें देश की बेटियों को पढ़ाने के लिए अग्रसर करना है जिसके लिए हमारे देश के कई महान कवियों ने बेटियों के ऊपर कुछ बेहतरीन कविताएं लिखी है जिन कविताओं को जानने के लिए आप यहाँ से जान सकते है |

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बेटी का महत्व पर कविता – बेटी पर छोटी कविता

Beti Ka mahatv Par Kavita – Beti Par Choti Kavita : अगर आप बेटी दिवस पर कविता, बेटी की विदाई पर कविता, बेटी पर कविता इन हिंदी, बेटी पढ़ाओ पर कविता, माँ और बेटी पर कविता, मां बेटी पर कविता, माँ बेटी पर कविता, बेटी पर कविता हिंदी में, बेटी पर भावुक कविता, मा बेटी पर कविता, लाड़ली बेटी पर कविता जानना चाहे तो इसके लिए आप यहाँ से जान सकते है :

बेटी है जग का आधार
जब माँ हीं जग में न होगी
तो तुम जन्म किससे पाओगे ?……..
जब बहन न होगी घर के आंगन में
तो किससे रुठोगे, किसे मनाओगे ?………
जब दादी-नानी न होगी
तो तुम्हें कहानी कौन सुनाएगा ?…
जब कोई स्वप्न सुन्दरी हीं न होगी
तो तुम किससे ब्याह रचाओगे ?……
जब घर में बेटी हीं न होगी
तो तुम किस पर लाड लुटाओगे ?…..
जिस दुनिया में स्त्री हीं न होगी
उस दुनिया में तुम कैसे रह पाओगे ?……
जब तेरे घर में बहु हीं न होगी
तो कैसे वंश आगे बढ़ाओगे ?…..
नारी के बिन जग सूना है
तुम ये बात कब समझ पाओगे ?….

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बेटी बचाओ पर कविता – बेटी पर मार्मिक कविता

बेटी बचाओ
कहती है बेटी हमें निहार
मुझे चाहिए प्यार दुलार।
बेटियों को क्यों
प्यार नहीं करता संसार।
सोचिये सभी क्या बेटी बिना
बन सकता है घर परिवार।
बचपन से लेके जवानी तक
मुझ पर लटक रहा तलवार।
मेरे दर्द और वेदना का
कब होगा स्थाई उपचार।
बढ़ते पानी में मैं बह गई
कौन करेगा नदी के पार।
मैं बेटी माता भी मैं हूँ
मैं ही दुर्गा काली अवतार।
मेरे प्यार में सभी सुखी हैं
मेरे बिना धरती अंधियार।
बेटी की दर्द और वेदना का
कब होगा स्थाई उपचार।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर छोटी कविता – बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ Kavita In Hindi – बेटियाँ पर कविता

नानी वाली कथा-कहानी, अब के जग में हुई पुरानी।
बेटी-युग के नए दौर की, आओ लिख लें नई कहानी।
बेटी-युग में बेटा-बेटी,
सभी पढ़ेंगे, सभी बढ़ेंगे।
फौलादी ले नेक इरादे,
खुद अपना इतिहास गढ़ेंगे।
देश पढ़ेगा, देश बढ़ेगा, दौड़ेगी अब, तरुण जवानी।
बेटी-युग के नए दौर की, आओ लिख लें नई कहानी।
बेटा शिक्षित, आधी शिक्षा,
बेटी शिक्षित पूरी शिक्षा।
हमने सोचा, मनन करो तुम,
सोचो समझो करो समीक्षा।
सारा जग शिक्षामय करना,हमने सोचा मन में ठानी।
बेटी-युग के नए दौर की, आओ लिख लें नई कहानी।
अब कोई ना अनपढ़ होगा,
सबके हाथों पुस्तक होगी।
ज्ञान-गंग की पावन धारा,
सबके आँगन तक पहुँचेगी।
पुस्तक और पैन की शक्ति,जगजाहिर जानी पहचानी।
बेटी-युग के नए दौर की, आओ लिख लें नई कहानी।
बेटी-युग सम्मान-पर्व है,
ज्ञान-पर्व है, दान-पर्व है।
सब सबका सम्मान करे तो,
जीवन का उत्थान-पर्व है।
सोने की चिड़िया बोली है, बेटी-युग की हवा सुहानी।
बेटी-युग के नए दौर की, आओ लिख लें नई कहानी।

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बेटी एक वरदान कविता – बेटी एक वरदान पोएम इन हिंदी

कभी बेटी, कभी बहन, कभी पत्नी, तो कभी माँ है नारी
पुरुष जिसके बिना असहाय है, ऐसी है नारी
कभी ममता की फुलवारी, तो कभी राखी की क्यारी है नारी
सृष्टि जिसके बिना थम जाए, ऐसी है नारी
पुरुषों की पूरी भीड़ पर अकेली भारी है नारी
जो सृष्टि को जलाकर राख कर दे, ऐसी चिंगारी है नारी
बेटी हो तो…….. पिता की राजदुलारी है नारी
माँ हो तो………. सन्तान पर हमेशा भारी है नारी
बहन हो तो……. भाई की लाडली है नारी
पत्नी हो तो…….. पति की जान है नारी
पुरुष हमेशा अधूरा तो…….. हमेशा पूरी है नारी
सृष्टि जिस पर घूम रही, वह धुरी है नारी
जब गर्भ में नहीं मरोगे, तभी तो तुम्हारी है नारी
जब नारी है………… तभी तो है ये सृष्टि सारी

बेटी पर कविता

बेटी के जन्म पर कविता

आज जब मैं जहां में आयी तो क्यों इंतेजार था किसी और का।
क्यों आते ही सताने लगा एक डर का एहसास तुम्हें माँ।
नारी के जन्म का अभिमान करो।
धरा की तरह सहती है कष्टों की बुनियाद।
फिर भी बस खुशियाँ ही तो लुटाती है नारी।
तो किस बात का अफ़सोस माँ।
एक दिन होके बड़ी पापा तुम्हारा सहारा बनूंगी।
बेटों से भी बढ़के मझदार में किनारा बनूँगी।
तो क्यों उदास हो पापा।
कितनी छोटी हूँ हाथों में तो उठाओ।
गले से लगाके मुस्कुराओ न माँ।
क्यों नारी ही अस्तित्व तलाशती है माँ।
क्या बेजान जिस्म है मेरा या सम्बेदना से दूर हूँ मैं।
जो हर बार गाल पे तमाचा सहती हूँ माँ।
क्यों पिता का कन्धा झुका सा रहता है।
क्यों नहीँ मुझपे भी फक्र होता है।
क्या कुछ अर्थ नहीँ मेरे जीवन का।
अनपूर्णा कहते हैं पर भूख मेरी ही अधूरी रह जाती है।
रातों को क्यों नहीँ कोई माथा सहलाता है मेरा।क्यों खफा होने पर मुझे कोई मनाता नहीँ।
फूल चढ़ाते हैं देवी पर।पर घर की देवी क्यों हर वक़्त तिरस्कृत रहती है माँ।
क्या आज मेरा ये मांगना गलत है की आज जब मैं जहां में आयी तो क्यों इंतेजार था
किसी और का।क्या कभी मेरे आने पर भी खुशियाँ मनायी जाएँगी?

बेटी के जन्मदिन पर कविता

बेटियों के ऊपर बहुत सारी कविताएं बनती है जिसके लिए आप हिन्दी कविता बेटी पर, बाप बेटी पर कविता, बेटी पर बाल कविता, पिता बेटी पर कविता, बेटी पढाओ पर कविता, बेटी की सगाई पर कविता, बेटी बचाओ अभियान पर कविता, beti पर कविता, बेटी बचाव पर कविता तथा अजन्मी बेटी पर कविता के बारे में यहाँ से जान सकते है :

जमाने की ये कहानी
कहती है एक लड़की जमाने की ये कहानी
जन्म लड़की का मिला है यही है उसकी नादानी
सभी कहते है ये उससे तेरी मुस्कान बड़ी सुदंर
मगर ये रीत कैसी है वो बाहर हसँ नही सकती।
है वो सपनो की दुनिया मे है चाहत चाँद छूने की
जमाने की ये हरकतें है बेड़ी उसकी राह की
कुछ कहते हैं, लड़की है कहाँ जायेगी ये अकेली
कोई कहता है दुनिया है नही बाहर निकलने की।
कोई कहता संभल चलना तू इज्जत है दो घरो की
घर वाले सभी कहते राजकुमारी है हमारी
कोई कहता के नाजुक सी कली मेरे घरौदे की
मगर ये है कली कैसी जो कभी खिल नही सकती।

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बेटी की शादी पर कविता – पिता और बेटी पर कविता

जिस रोज़ से बिटिया रानी,
तू बाबुल आँगन छोड़ चली गयी,
मिलन को तरस रहे है नैना,
क्यों बाबुल से मुख मोड़ चली गयी,
अति हुई है अब तो आजा,
प्यासी आँखे द्वारे टिकी रहती है !!
निर्झर बरसते है हम सब के नैना, कपोलो पे जल धारा बहती है !
घुमड़-घुमड़ उमड़े मन बदरा, बिटिया जब याद तुम्हारी आती है !!
सूना पड़ा है कोना कोना ,
घर में नजर न रौनक आये
तेरे बंचपन कि अठखेलिया,
रह-रह पागल मन को सताये,
आस लगी है तेरे मिलन की,
हर पल तू ही खयालो में रहती है !!
निर्झर बरसते है हम सब के नैना, कपोलो पे जल धारा बहती है !
घुमड़-घुमड़ उमड़े मन बदरा, बिटिया जब याद तुम्हारी आती है !!
पूछते है ये दर और दीवारे,
अब तो धूमिल हुई है तेरी किताबे,
चुनर लटकी एक कोने में,
तेरे आँचल पे सवरने को ललचाती है,
कब आयेगी मेरी लाडली,
घर की एक चीज़ मुझसे ये कहती है !!
निर्झर बरसते है हम सब के नैना, कपोलो पे जल धारा बहती है !
घुमड़-घुमड़ उमड़े मन बदरा, बिटिया जब याद तुम्हारी आती है !!
रसोई में रहता है सूनापन,
कुटिया में खामोशी छायी रहती है
वो चिड़िया भी नित आती आँगन
चीं चीं कर तेरे ही नाम को रटती है,
सदा करे बस सवाल एक ही,
मेरी सहेली से मिलवा दो ,कहकर उड़ जाती है !!
निर्झर बरसते है हम सब के नैना, कपोलो पे जल धारा बहती है !
घुमड़-घुमड़ उमड़े मन बदरा, बिटिया जब याद तुम्हारी आती है !!
बात करता हूँ तस्वीरो से
मगर आवाज न उनसे तेरी आती है
धुंधला पड़ा आईना कोने में,
जब देखूं तेरी परछाई नजर आती है,
मत तरसा लाडली अब तो आजा,
क्यों बूढी आँखों को तड़पाती है !!
निर्झर बरसते है हम सब के नैना, कपोलो पे जल धारा बहती है !
घुमड़-घुमड़ उमड़े मन बदरा, बिटिया जब याद तुम्हारी आती है !!
छुटकी भी अब हुई सयानी,
जो पहले बात बात पर तुझे सताती थी,
अब धीर गंभीर करती बाते,
जिसकी हँसी से ये कुटिया गुंजयाती थी
लगने लगी है अब बड़ी अबोध
जाने क्यों वो भी गुमसुम सी रहती है !!
निर्झर बरसते है हम सब के नैना, कपोलो पे जल धारा बहती है !
घुमड़-घुमड़ उमड़े मन बदरा, बिटिया जब याद तुम्हारी आती है !!
तख़्त पे बैठी बूढी मैय्या ,
हर आहट पे नाम तेरा बुलाती है
जिगर तो तेरे संग गया
अब निर्जर देह प्राणों से लड़ती है
अब कैसे उसको समझाऊ,
बिटिया नही रही अब तेरी, वो तो हुई पराई है !!
निर्झर बरसते है हम सब के नैना, कपोलो पे जल धारा बहती है !
घुमड़-घुमड़ उमड़े मन बदरा, बिटिया जब याद तुम्हारी आती है !!

1 Comment

1 Comment

  1. आनन्द विश्वास

    October 11, 2018 at 11:59 pm

    *बेटी-युग*
    …आनन्द विश्वास
    सतयुग, त्रेता, द्वापर बीता, बीता कलयुग कब का,
    बेटी-युग के नए दौर में, हर्षाया हर तबका।
    बेटी-युग में खुशी-खुशी है,
    पर महनत के साथ बसी है।
    शुद्ध-कर्म निष्ठा का संगम,
    सबके मन में दिव्य हँसी है।

    bhut hi acchi jankari di hai

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