सुनील जोगी की कविताएँ – डॉ. सुनील जोगी की हास्य कविता – Dr. Sunil Jogi Poetry in Hindi Language

डॉ. सुनील जोगी की हास्य कविता

डॉ सुनील जोगी इस समय में एक जानेमाने कवी और शायर हैं| उनकी शायरिया और कविता बहुत अच्छी होती हैं| उनका जन्म 1 जनवरी 1971 में हुआ था| उनकी माता का नाम अरुन्दति देवी और पिता का नाम राम प्रकाश त्रिवेदी हैं| यह उत्तर प्रदेश के कानपूर जिले के रहने वाले हैं| इनकी हास्य कविता बहुत प्रसिद्ध हैं| इन्होने हिंदी साहित्य से पीएचडी करि हैं| इनको 16 फरवरी 2015 को इनकी कविताओं के लिए पदम् श्री से सम्मानित करा था| हमारे इस पोस्ट में डॉ सुनील जोगी की कुछ बेहद ही प्रसिद्ध कविताए हैं जिन्हे पढ़कर आप हर्षो उल्लास से भर जाएंगे|

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सुनील जोगी कविता कोश – Sunil Jogi Poem Mushkil Hai Apna Mel Priye

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मुश्किल है अपना मेल प्रिये
ये प्‍यार नहीं है खेल प्रिये
तुम एम.ए. फर्स्‍ट डिवीजन हो
मैं हुआ मैट्रिक फेल प्रिये
तुम फौजी अफसर की बेटी
मैं तो किसान का बेटा हूं
तुम रबडी खीर मलाई हो
मैं तो सत्‍तू सपरेटा हूं
तुम ए.सी. घर में रहती हो
मैं पेड. के नीचे लेटा हूं
तुम नई मारूति लगती हो
मैं स्‍कूटर लम्‍ब्रेटा हूं
इस तरह अगर हम छुप छुप कर
आपस में प्‍यार बढाएंगे
तो एक रोज तेरे डैडी
अमरीश पुरी बन जाएंगे
सब हड्डी पसली तोड. मुझे
भिजवा देंगे वो जेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये
ये प्‍यार नहीं है खेल प्रिये
तुम जयप्रदा की साडी हो
मैं शेखर वाली दाढी हूं
तुम सुषमा जैसी विदुषी हो
मैं लल्‍लू लाल अनाडी हूं
तुम जया जेटली सी कोमल
मैं सिंह मुलायम सा कठोर
मैं हेमा मालिनी सी सुंदर
मैं बंगारू की तरह बोर
तुम सत्‍ता की महारानी हो
मैं विपक्ष की लाचारी हूं
तुम हो ममता जयललिता सी
मैं क्‍वारा अटल बिहारी हूं
तुम संसद की सुंदरता हो
मैं हूं तिहाड. की जेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये
ये प्‍यार नहीं है खेल प्रिये

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सुनील जोगी के मुक्तक

कलयुग में अब ना आना रे प्यारे कृष्ण कन्हैया
तुम बलदाऊ के भाई यहाँ हैं दाउद के भैया।।
दूध दही की जगह पेप्सी, लिम्का कोकाकोला
चक्र सुदर्शन छोड़ के हाथों में लेना हथगोला
काली नाग नचैया। कलयुग में अब. . .।।
कलयुग में अब. . .।।
विश्व सुंदरी बनकर फ़िल्में करेंगी राधा रानी
और गोपियाँ हो जाएँगी गोविंदा दीवानी
छोड़के गोकुल औ’ मथुरा बनना होगा बंबइया।
कलयुग में अब. . .।।
साड़ी नहीं द्रौपदी की अब जीन्स बढ़ानी होगी
अर्जुन का रथ नहीं मारुति कार चलानी होगी
ईलू-ईलू गाना होगा गीता गान गवैया।
कलयुग में अब. . .।।
आना ही है तो आ जाओ बाद में मत पछताना
कंप्यूटर पर गेम खेलकर अपना दिल बहलाना
दुर्योधन से गठबंधन कर बनना माल पचइया।
कलयुग में अब. . .।।

 Sunil Jogi Best Poem

किसी गीता से न कुरआँ से अदा होती है
न बादशाहों की दौलत से अता होती है
रहमतें सिर्फ़ बरसती हैं उन्हीं लोगों पर
जिनके दामन में बुज़ुर्गों की दुआ होती है।
हर इक मूरत ज़रूरत भर का पत्थर ढूँढ लेती है
कि जैसे नींद अपने आप बिस्तर ढूँढ लेती है
चमन में फूल खिलता है तो भौंरें जान जाते हैं
नदी खुद अपने कदमों से समंदर ढूँढ लेती है।
लगे हैं फ़ोन जब से तार भी नहीं आते
बूढ़ी आँखों के मददगार भी नहीं आते
गए हैं जब से कमाने को शहर में लड़के
हमारे गाँव में त्यौहार भी नहीं आते।
बहारें रूठ जाएँ तो मनाने कौन आता है
सवेरे रोज़ सूरज को जगाने कौन आता है
बड़े होटल में बैरे रोटियाँ गिन गिन के देते हैं
वहाँ अम्मा की तरह से खिलाने कौन आता है।

डॉ सुनील जोगी की कविता – Dr Sunil Jogi Latest Poem

कोई श्रृंगार करता है, तो दरपन याद आता है
बियाही लड़कियों को जैसे, सावन याद आता है
वो बारिश में नहाना, धूप में नंगे बदन चलना
पुराने दोस्त मिलते हैं, तो बचपन याद आता है।
जो भी होता है वो, इस दौर में कम लगता है
हर एक चेहरे पे दहशत का भरम लगता है
घर से निकला है जो स्कूल को जाने के लिए
अब तो उस बच्चे के बस्ते में भी बम लगता है।
नए साँचे में ढलना चाहता है
गिरा है, फिर संभलना चाहता है
यहाँ दुनिया में हर इक जिस्म ‘जोगी’
पुराना घर बदलना चाहता है।
मैं बेघर हूँ, मेरा घर जानता है
बहुत जागा हूँ, बिस्तर जानता है
किसी दरिया को जाकर क्या बताऊँ
मैं प्यासा हूँ, समंदर जानता है।
मैं कलाकार हूँ, सारी कलाएँ रखता हूँ
बंद मुट्ठी में आवारा हवाएँ रखता हूँ
क्या बिगाड़ेंगी ज़माने की हवाएँ मेरा
मैं अपने साथ में माँ की दुआएँ रखता हूँ।
खुशी का बोलबाला हो गया है
अंधेरे से उजाला हो गया है
पड़े हैं पाँव जब से माँ के ‘जोगी’
मेरा घर भी शिवाला हो गया है।
छोटे से दिल में अपने अरमान कोई रखना
दुनिया की भीड़ में भी पहचान कोई रखना
चारों तरफ़ लगा है बाज़ार उदासी का
होठों पे अपने हरदम, मुस्कान बनी रखना।
जो नहीं होता है उसका ही ज़िकर होता है
हर इक सफ़र में मेरे साथ में घर होता है
मैं इक फ़कीर से मिलकर ये बात जान गया
दवा से ज़्यादा दुआओं में असर होता है।

सुनील जोगी की कविताएँ

Sunil Jogi Hindi Gadh – Sunil Jogi Poems Lyrics

कभी हमको हंसाती है, कभी हमको रूलाती है
जिन्‍हें जीना नहीं आता, उन्‍हें जीना सिखाती है,
खुदा के नाम पर लिक्‍खी, ये दीवानों की पाती है
मोहब्‍बत की नहीं जाती, मोहब्‍बत खुद हो जाती है ।
खुदा के सामने दिल से इबादत कौन करता है
तिरंगा हाथ में लेकर शहादत कौन करता है
ये कसमें और वादे चार दिन में टूट जाते हैं
वो लैला और मजनूं सी मोहब्‍बत कौन करता है ।
जीतने में क्‍या मिलेगा, जो मजा है हार में
जिन्‍दगी का फलसफा है, प्‍यार के व्‍यापार में
हम तो तन्‍हा थे, हमारा नाम लेवा भी न था
इस मोहब्‍बत से हुआ चर्चा सरे बाजार में ।
सदा मिलने की चाहत की, जुदा होना नहीं मांगा
हमें इंसान प्‍यारे हैं, खुदा होना नहीं मांगा
हमेशा मंदिरो मस्जिद में, मांगा है मोहब्‍बत को
कभी चांदी नही मांगी, कभी सोना नहीं मांगा ।

सुनील जोगी की कविता – Sunil Jogi Kavita Maa

तुम नई विदेशी मिक्सी हो
मैं पत्थर का सिलबट्टा हूं
तुम ए.के. सैंतालिस जैसी
मैं तो इक देसी कट्टा हूं
तुम चतुर राबडी देवी सी
मैं भोला-भाला लालू हूं
तुम मुक्त शेरनी जंगल की
मैं चिडि.याघर का भालू हूं
तुम व्यस्त सोनिया गांधी सी
मैं वी.पी. सिंह सा खाली हूं
तुम हंसी माधुरी दीक्षित की
मैं पुलिस मैन की गाली हूं
गर जेल मुझे हो जाए तो
दिलवा देना तुम बेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये
ये प्यार नहीं है खेल प्रिये
मैं ढाबे के ढांचे जैसा
तुम पांच सितारा होटल हो
मैं महुए का देसी ठर्रा
तुम चित्रहार का मधुर गीत
मैं कृषि दर्शन की झाडी हूं
तुम विश्व सुंदरी सी महान
मैं ठेलिया छाप कबाडी हूं
तुम सोनी का मोबाइल हूं
मैं टेलीफोन वाला चोंगा
तुम मछली मानसरोवर की
मैं सागर तट का हूं घोंघा
दस मंजिल से गिर जाउंगा मत आगे मुझे ढकेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये
ये प्यार नहीं है खेल प्रिये
तुम जयप्रदा की साडी हो
मैं शेखर वाली दाढी हूं
तुम सुषमा जैसी विदुषी हो
मैं लल्लू लाल अनाडी हूं
तुम जया जेटली सी कोमल
मैं सिंह मुलायम सा कठोर
तुमहेमा मालिनी सी सुंदर
मैं बंगारू की तरह बोर
तुम सत्ता की महारानी हो
मैं विपक्ष की लाचारी हूं
तुम हो ममता जयललिता सी
मैं क्वारा अटल बिहारी हूं
तुम संसद की सुंदरता हो
मैं हूं तिहाड. की जेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये
ये प्यार नहीं है खेल प्रिये.

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