शरद पूर्णिमा त्योहार व्रत कथा तथा महत्व

शरद पूर्णिमा त्योहार व्रत कथा तथा महत्व

Sharad Purnima Tyohar Vrat Katha Tatha Mahatv : शरद पूर्णिमा जिसे हम रास पूर्णिमा या कोजागरी पूर्णिमा के नाम से भी जानते है हिन्दू धर्म में इन दिनों व्रतों का महत्व होता है और इस व्रत को कौमुदी व्रत भी कहते है | इस पूर्णिमा का रास पूर्णिमा कहने का कारन यह है की इसी दिन भगवान श्री कृष्णा ने महारास रचाया था हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है की इस दिन चन्द्रमा की किरणों से अमृत झड़ता है | इसीलिए आज हम आपको शरद पूर्णिमा के त्यौहार के बार में जानकारी देते है की इस दिन आपको व्रत किस प्रकार रखना चाहिए या इस व्रत का महत्व है ? पूरी जानकारी आप हमारी इस पोस्ट के माध्यम से पा सकते है |

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शरद पूर्णिमा 2017 | शरद पूर्णिमा कब है

Sharad Purnima 2017 | Sharad Purnima Kab Hai : शरद पूर्णिमा के दिन पूरे साल में चन्द्रमा केवल इसी दिन अपनी सभी सोलह कलाओ से परिपूर्ण होता है इसीलिए हिन्दू पंचांग के अनुसार अश्विन मास की पूर्णिमा के दिन ही हम शरद पूर्णिमा मनाते है लेकिन अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार हर साल इसकी तारीख अलग-2 प्रकार से होती है | साल 2017 में शरद पूर्णिमा 5 अक्टूबर को पड़ रही है |

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शरद पूर्णिमा व्रत पूजा विधि

Sharad Purnima Vrat Puja Vidhi : यदि आप शरद पूर्णिमा का व्रत करते है तो इसके लिए हम आपको बताते है की आपको किस प्रकार से किस विधि से इस दिन पूजा करनी होगी :

  1. सबसे पहले पूर्णिमा के दिन सुबह जल्दी उठ कर स्नान करके व्रत का संकल्प लेना चाहिए |
  2. इस दिन माँ लक्ष्मी की पूजा की जाती है इसीलिए उन्ही के लिए पूरे दिन उपवास रखा जाता है |
  3. संध्या के समय देवी लक्ष्मी जी की विधिपूर्वक पूजा करने का प्रावधान है |
  4. उसके बाद चन्द्रमा के आकाश में दिखने के पश्चात उनकी पूजा करके उपवास खोलना चाहिए |
  5. पूर्णिमा के दिन खीर को बना कर चन्द्रमा की रौशनी में रख दे क्योकि इसी दिन चंद्र की किरणों से अमृत निकलता है इसीलिए खीर अमृत बन जाती है |
  6. रात भर जगराता करे और भजन व गीत गाये तथा रात्रि 12 बजे चन्द्रमा की रौशनी में रखी हुई खीर का भोग भगवान को लगा कर उसका प्रसाद वितरित करे |

शरद पूर्णिमा 2017

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शरद पूर्णिमा व्रत कथा

Sharad Purnima Vrat Katha : एक कथा के अनुसार एक साहूकार था और उसकी दो कन्या थी जो की बहुत सुशील और समझदार थी जिसमे से दोनों कन्याये पूर्णिमा का व्रत रखती थी लेकिन उस साहूकार की बड़ी पुत्री धार्मिक प्रवृत्ति की थी | जिसकी वजह से वह तो व्रत को पूरा कर लेती थी लेकिन छोटी कन्या व्रत को पूरा नहीं कर पाती थी और व्रत को अधूरा ही छोड़ देती थी | और जैसे ही वह दोनों बड़ी होती है तो दोनों को शादी हो जाती है |लेकिन छोटी पुत्री के जब भी कोई संतान होती वह संतान तुरंत मर जाती थी |

उस छोटी पुत्री ने महान पंडितो से इसका कारण पूछा तब उन्होंने बताया की तुमने शरद पूर्णिमा के व्रत को अधूरा छोड़ दिया जिसकी वजह से यह सब तुम्हारेसाथ हो रहा है | तब उस स्त्री ने पंडितो से इसका संधान पूछा तो उन्होंने बताया की तुम्हे शरद पूर्णिमा का व्रत विधिपूर्वक करना होगा जिससे की तुम्हरी संतान जीवित हो उठेगी |

शरद पूर्णिमा का महत्व

Sharad Purnima Ka Mahatv : तभी साहूकार की छोटी पुत्री को एक लड़के के रूप में एक और संतान प्राप्त हुई है लेकिन वह भी मर गया तब उसने अपने बच्चे को पीठ के बल लिटा कर उसके ऊपर कपडा ढक दिया | उसके बाद उसने अपने कमरे में अपनी बहन को बुलाया और उस कपडे के ऊपर बैठने को कहा लेकिन बड़ी बहन अंजान थी और वह बैठने लगी उसके स्पर्श मात्र से ही वह बच्चा रोने लगा | तब उसकी बड़ी बहन ने उससे पूछा की तू ये क्या कर रही है अपने बच्चे के ऊपर मुझे बिठा कर मेरे ऊपर पाप लगाना चाहती है अभी तेरा बच्चा मर जाता तो ? तब उसने बताया की दीदी मेरा बच्चा तो पहले से ही मरा हुआ लेकिन आपके पुण्यो की वजह से आपके स्पर्श मात्र से यह मरा हुआ बालक जीवित हो उठा | तभी से यह कथा प्रचलित हो गयी |

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