विष्णु सक्सेना की कविता – Vishnu Saxena Poetry in Hindi

विष्णु सक्सेना की कविता

डॉ विष्णु सक्सेना आज के समय के सबसे प्रचलित कवियों में से एक में आते है| इनका जनम भारत के उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में हुआ था| इन्हे बचपन से कविताए लिखने का शॉक था| इन्होने हिंदी साहित्य से पीएचडी की हैं| इनके गीतों और कविताओं ने भारत के लाखो करोड़ो लोगो का दिल जीता हैं| इनकी कविताए सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विदेश में भी प्रसिद्ध हैं | यह अपनी मधुर और मीठी आवाज़ के लिए भी जाने जाते हैं| इनके गाने का तरीका सबके दिल को छु जाता हैं| आज हम आपको हमारे इस पोस्ट में डॉ विष्णु सक्सेना की बहुत ही प्रसिद्ध कविताओं का वर्णन करेंगे जिसे पढ़कर आपका दिल भी प्रफुल्लित हो जाएगा|

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डॉ विष्णु सक्सेना की गजलें शायरी – Vishnu Saxena Muktak Lyrics

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छोड़ चली क्यों साथ सखी री?
इसीलिए हमसे रचवाए क्या मेंहदी से हाथ सखी री!
गुमसुम होगी कल ये देहरी,
सिसकेगा घर का अंगना।
रोएँगी गुलशन की कलियाँ,
हिलकी-भर रोयें कंगना।
सूरज खाने को दौड़ेगा, डसे चंदनिया रात सखी री।
जिनके संग पंचगोटी खेली,
जिनके संग गुड्डा-गुड़िया।
कोई कहे मेरे बाग की बुलबुल,
कोई मैना, कोई चिड़िया।
जिस गोदी में खेली-कूदी, छूटे वे पितु-मात सखी री!
भइया याद दिलाए राखी,
भाभी होली फागुन की।
जब पीहर से जाए तू, माँ-
याद दिलाए सावन की।
सबके दिल दरपन जैसे हैं, देना ना आघात सखी री!
जा री जा, तेरे दामन में-
खुशियाँ हों दुनिया-भर की,
जैसे लाज रखी इस घर की-
वैसे रखना उस घर की
शुभ हो तुझे नया घर, लो जा खुशियों की सौग़ात सखी री!

तृप्त मयूरी हो ना पाई – Dr Vishnu Saxena Wah Wah Kya Baat Hai

तृप्त मयूरी हो ना पाई, प्यासी ही रह गई चातकी,
सत्य छिपाना तुमने सीखा, मेरी आदत खरी बात की।
मैंने वंदनवार सजाए,
क्या तुमको आभास हुआ?
कलियों ने अपमान सहा है,
फूलों का परिहास हुआ।
रात तुम्हारी सदा सुहागन, मेरी चिंता है प्रभात की,
सत्य छिपाना तुमने सीखा, मेरी आदत खरी बात की।
विरह-व्यथा आँसू ने कह दी,
मैंने मन की पीर छिपाई।
केवल था सुधियों में जीवन,
जीवन की सुधि कभी न आई।
ईश्वर से सबने है पाया, मुझ से विधि ने बड़ी घात की
सत्य छिपाना तुमने सीखा, मेरी आदत खरी बात की।
कैसे जन्म सार्थक मानूँ,
जब जीवन में तुम्हीं न आए?
वरदानों से भरे जगत में,
मैंने केवल शाप कमाए।
एक रंज जीवन की निधि है, शतरंजों ने कहाँ मात की
सत्य छिपाना तुमने सीखा, मेरी आदत खरी बात की।
हम-तुम ऐसे दूर रहे हैं,
जैसे दूर नदी के तट हैं।
कौन भरोसा करे यहाँ पर,
पग-पग पर बिछ रहे कपट हैं।
मन-अशांत की शांत नदी में, कल-कल भाई कब प्रपात की?
सत्य छिपाना तुमने सीखा, मेरी आदत खरी बात की।

Vishnu Saxena Poem in Hindi PDF – विष्णु सक्सेना मन का कोरा दर्पन

मन का कोरा दर्पन तेरे नाम करूँ।
भँवरों का मदमाता गुंजन,
तितली की बलखाती थिरकन,
भीनी-भीनी गंध पुष्प की,
कलियों का छलका-सा यौवन
हरा-भरा ये उपवन तेरे नाम करूँ।
मन का कोरा दर्पन तेरे नाम करूँ।
शीतल मेघ छटा केशों में,
पलकों में दुनिया सपनों की,
गालों में है भाव गुलाबी,
अधरों पर बातें अपनों की।
दहका-सा आलिंगन तेरे नाम करूँ।
मन का कोरा दर्पन तेरे नाम करूँ।
करूँ निछावर ऋतुएँ तुझ पर,
बातें करूँ रंगोली से,
दीवाली से करूँ आऱती,
नज़र उतारूँ होली से।
भीगा-भीगा सावन तेरे नाम करूँ।
मन का कोरा दर्पन तेरे नाम करूँ।

Dr. Vishnu Saxena Hindi Poems – दुख में सुख की मधुर कल्पना

दुःख में सुख की मधुर कल्पना कैसा सुघड़ निदान है।
प्यासों को दो बूँद ओस की मिली, मिला भगवान है।।
जब माँ से चंदा की ज़िद की,
कहा, चाँदनी तेरी है।
सुख का दिवस बहुत छोटा,
पर दुःख की रात घनेरी है।
ऐसी ज़िद न कर रे लाडले, तू कैसा नादान है।
प्यासे को दो बूँद ओस की मिलीं, मिला भगवान है।
संबंधों के अनुबंधों में,
अंधियारा ही अंधियारा।
जाने किसकी नज़र लगी,
जो टूटा दरपन बेचारा?
सगुण पात्र में ऊधौ कैसा ये निर्गुण पकवान है?
प्यासे को दो बूँद ओस की मिलीं, मिला भगवान है।
नयन उनींदे विवरण देंगे
मेरी बीती रातों का।
समय किसी का सगा नहीं है,
मन आदी आघातों का।
अभिशापों का बोझ मुझी पर, कब पाया वरदान है?
प्यासे को दो बूँद ओस की मिलीं, मिला भगवान है।
एक नई परिभाषा लिख दे,
युग की स्वर्णिम स्याही से।
निश्छल प्रेम करें जन-जन से,
जैसे मंज़िल राही से।
यहीं हुए अवतार, यहीं पूजा जाता पाषाण है।
प्यासे को दो बूँद ओस की मिलीं, मिला भगवान है।

डॉ विष्णु सक्सेना के गीत – Vishnu Saxena Geet

हाथ की ये लकीरें, लकीरें नहीं
ज़ख़्म की सूचियाँ हैं, इन्हें मत पढ़ो
दिल से उठते धुएँ को धुआँ मत कहो,
दर्द की आँधियाँ हैं, इन्हें मत पढ़ो!
मुसकराई जो तुम स्वप्न आने लगे,
खिलखिलाईं तो दिन भी सुहाने लगे,
जब तुम्हारी नज़र ने हमें छू लिया,
अपनी आँखों के आँसू सुखाने लगे,
अब न आँसू, न सपने, न कोई चमक
खोखली सीपियाँ हैं, इन्हें मत पढ़ो!
मछलियाँ थीं मगर जाल डाले नहीं
पास कंकर बहुत पर उछाले नहीं,
तुमको सीमाएँ अच्छी लगी इसलिए,
पाँव चादर से बाहर निकाले नहीं।
पृष्ठ कोरे हैं तो क्या हुआ फेंक दो-
अनलिखी चिट्ठियाँ हैं इन्हें मत पढ़ो!
उम्र-भर हाथ सबको दिखाते रहे,
और निराशा में आशा बँधाते रहे,
जब से देखा तुम्हें फूल से प्यार है,
हम मुंडेरों पे गमले सजाते रहे,
चुभ रहे जो तुम्हें तेज़ काँटे नहीं,
ये मेरी उँगलियाँ हैं, इन्हें मत पढ़ो।
मन बहकने लगा और घबरा गए,
भूख इतनी लगी धूप भी खा गए,
ज़िंदगी-भर बबूलों में भटका किए,
लौटकर अब उसूलों के घर आ गए,
अब पहाड़े सही याद कर लीजिए,
जो ग़लत गिनतियाँ हैं उन्हें मत पढ़ो!

Vishnu Saxena Poetry in Hindi

डॉ विष्णु सक्सेना शायरी

हो सके तो मुझे गीत दे दीजिए,
मैं अधूरा पड़ा संकलन की तरह,
मैं तुम्हें गुनगुना लूँ ग़ज़ल की तरह,
तुम मुझे खुल के गाना भजन की तरह।
तुम बनो राधिका तो तुम्हारी कसम,
कृष्ण-सा कोई वादा करूँगा नहीं,
जानकी बन के आओ अगर घर मेरे,
राम जैसा इरादा करूँगा नहीं।
प्रेम के यज्ञ में त्याग की आहुति-
डाल दो, मन जला है हवन की तरह।
माना गंभीर हम वेद जैसे रहे,
किंतु तुम भी ऋचाओं-सी चुप-चुप रहीं,
बंधनों के निबंधों को मैंने लिखा,
फिर भी नूतन कथाएँ न तुमने कही।
प्रीति-पथ पर चलें, साँझ से क्यों ढलें?
तुम थकन की तरह में सपन की तरह।
मैंने चाहा बहुत, गीत गाऊँ मगर,
तुमने वीणा के तारों को छेड़ा नहीं,
तुमने आने का मन ही बनाया नहीं,
रास्ता वरना घर का था टेढ़ा नहीं।
तुम तो सौभाग्यशाली रही हो सदा,
भाग्य अपना बना है करण की तरह।

आँखों में पाले

आँखों में पाले तो पलकें भिगो गए
वासंती मौसम भी पतझड़
से हो गए
बीते क्षण बीते पल जीत और हार में
बीत गयी उम्र सबझूठे सत्कार में
भोर और संध्या सब करवट
ले सो गए
जीवन की वंशी में साँसों का राग है
कदमों में काँटे हैं हाथों में आग है
अपनों की भीड़ में सपने
भी खो गए
रीता है पनघट रीती हर आँख है
मुरझाए फूलों की टूटी हर पाँख है
आँधियों को देख कर उपवन
भी रो गए
कितना अजीब फूल काँटे का मेल,
जीवन है गुड्डे और गुड़्यों का खेल,
पथरीले मानव को तिनके
भिगो गए।

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जब कभी भी हो तुम्हारा मन

जब कभी भी हो तुम्हारा मन चले आना
द्वार के सतिये तुम्हारी हैं प्रतीक्षा में
हाथ से कांधों को हमने थाम कर
साथ चलने के किये वादे कभी
मन्दिरों दरगाह पीपल सब जगह
जाके हमने बाँधे थे धागे कभी
प्रेम के हर एक मानक पर खरे थे हम
बैठ ना पाये न जाने क्यों परीक्षा में
हम जलेंगे और जीयेंगे उम्रभर
अपना और दिये का ये अनुबन्ध है
तेज़ आँधी भी चलेगी साथ में
पर बुझायेगी नहीं सौगन्ध है
पुतलियाँ पथरा गयीं पथ देखते पल-पल
आँख को शायद मिला ये मंत्र दीक्षा में
अक्षरों के साथ बंध हर पँक्ति में
याद आयी है निगोडी गीत में
प्रीत की पुस्तक अधूरी रह गयी
सिसकियाँ घुलने लगीं सँगीत में
दर्द का ये संकलन मिल जाये तो पढना
मत उलझना तुम कभी इसकी परीक्षा में

थाल पूजा का लेकर

थाल पूजा का लेकर चले आईये,
मंदिरों की बनावट सा घर है मेरा !
आरती बन के गूँजो दिशाओं में तुम,
और पावन सा कर दो शहर ये मेरा !
दिल की धड़कन के स्वर जब तुम्हारे हुए,
बाँसुरी को चुराने से क्या फायदा !
बिन बुलाए ही हम पास बैठे यहाँ,
फिर ये पायल बजाने से क्या फायदा !
डगमगाते डगों से ना नापो डगर,
देखिये बहुत नाज़ुक जिगर है मेरा ! थाल पूजा का लेकर……..
झील सा मेरा मन एक हलचल भरी,
नाव जीवन की उसमें बहा दीजिए !
घर के गमलों में जो नागफनियाँ लगी,
फैंकिये रातरानी सजा दीजिये !
जुगनुओं अब दिखा दो मुझे रास्ता,
रात काली है लम्बा सफ़र है मेरा ! थाल पूजा का लेकर………
जो भी कहना है कह दीजिये बेहिचक,
उँगलियों से ना यूँ उँगलियाँ मोड़िये !
तुम हो कोमल सुकोमल तुम्हारा हृदय,
पत्थरों को ना यूँ काँच से तोडिये !
कल थे हम तुम जो अब हमसफ़र बन गए,
आइये आइये घर इधर है मेरा ! थाल पूजा का लेकर………

रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा

रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा, एक आई लहर कुछ बचेगा नहीं।
तुमने पत्थर सा दिल हमको कह तो दिया पत्थरों पर लिखोगे मिटेगा नहीं।
मैं तो पतझर था फिर क्यूँ निमंत्रण दिया
ऋतु बसंती को तन पर लपेटे हुये,
आस मन में लिये प्यास तन में लिये
कब शरद आयी पल्लू समेटे हुये,
तुमने फेरीं निगाहें अँधेरा हुआ, ऐसा लगता है सूरज उगेगा नहीं।
मैं तो होली मना लूँगा सच मानिये
तुम दिवाली बनोगी ये आभास दो,
मैं तुम्हें सौंप दूँगा तुम्हारी धरा
तुम मुझे मेरे पँखों को आकाश दो,
उँगलियों पर दुपट्टा लपेटो न तुम, यूँ करोगे तो दिल चुप रहेगा नहीं।
आँख खोली तो तुम रुक्मिणी सी लगी
बन्द की आँख तो राधिका तुम लगीं,
जब भी सोचा तुम्हें शांत एकांत में
मीरा बाई सी एक साधिका तुम लगी,
कृष्ण की बाँसुरी पर भरोसा रखो, मन कहीं भी रहे पर डिगेगा नहीं।

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