मीराबाई की कविताएँ – Mirabai Poems In Hindi

मीराबाई की कविताएँ

मीरा बाई एक बहुत ही प्रसिद्ध और जानी मानी कवित्री थी| उनके कविता और श्लोक आज भी सब सुनते हैं| वह भगवान् श्री कृष्ण की बहुत ही बड़ी भक्त थी| उनकी हर श्लोक और कविता में श्री कृष्ण की भक्ति छलकती हैं| जब भी भगवान् श्री कृष्ण की भक्ति की बात आती हैं तो मीरा बाई का नाम उन प्रसिद्ध लोगो में आता हैं जिन्होंने श्री कृष्ण की भक्ति के लिए अपना पूरा जीवन त्याग दिया| ऐसे मधुर श्लोक सुनने में सबको अच्छे लगते हैं| तो चलिए आज हम आपको मीरा बाई के कुछ गए हुए श्लोक और कविता हिंदी, गुजराती, उर्दू, कन्नड़, इंग्लिश, मराठी, मलयालम, पंजाबी, तमिल में बताते हैं जिन्हे पढ़कर आप भी कृष्ण भक्ति में लीन हो जाएंगे |

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Mirabai Poetry In Hindi – Meerabai Poet

कठण थयां रे माधव मथुरां जाई। कागळ न लख्यो कटकोरे॥टेक॥
अहियाथकी हरी हवडां पधार्या। औद्धव साचे अटक्यारे॥१॥
अंगें सोबरणीया बावा पेर्या। शीर पितांबर पटकोरे॥२॥
गोकुळमां एक रास रच्यो छे। कहां न कुबड्या संग अतक्योरे॥३॥
कालीसी कुबजा ने आंगें छे कुबडी। ये शूं करी जाणे लटकोरे॥४॥
ये छे काळी ने ते छे। कुबडी रंगे रंग बाच्यो चटकोरे॥५॥

मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। खोळामां घुंघट खटकोरे॥६॥
कमल दल लीचमआं थे नाथ्यां काल भुजंग
कमल दल लीचमआं थे नाथ्यां काल भुजंग।।टेक।।
कालिन्दी दह नाग नक्यो काल फण फण निर्त अंत।
कूदां जल अन्तर णां डर्यौ को एक बाहु अणन्त।
मीरां रे प्रभु गिरधरनागर, ब्रजवणितांरो कन्त।।

कृष्ण करो जजमान
कृष्ण करो जजमान॥ प्रभु तुम॥टेक॥
जाकी किरत बेद बखानत। सांखी देत पुरान॥२॥
मोर मुकुट पीतांबर सोभत। कुंडल झळकत कान॥३॥
मीराके प्रभू गिरिधर नागर। दे दरशनको दान॥४

करम गत टाराँ णाही टराँ
करम गत टाराँ णाही टराँ।।टेक।
सतबादी हरिचन्दा राजा, डोम घर णीराँ भराँ।
पांच पांडु री राणी द्रुपता, हाड़ हिमालाँ गराँ।
जाग कियाँ बलि लेण इन्द्रासण, जाँयाँ पातला पराँ।
मीराँ रे प्रभु गिरधरनागर, बिखरूं अम्रित कराँ।।

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Poems Written By Mirabai – Poetry of Meera Bai

कृष्ण मंदिरमों मिराबाई नाचे
कृष्ण मंदिरमों मिराबाई नाचे तो ताल मृदंग रंग चटकी।
पावमों घुंगरू झुमझुम वाजे। तो ताल राखो घुंगटकी॥१॥
नाथ तुम जान है सब घटका मीरा भक्ति करे पर घटकी॥टेक॥
ध्यान धरे मीरा फेर सरनकुं सेवा करे झटपटको।
सालीग्रामकूं तीलक बनायो भाल तिलक बीज टबकी॥२॥
बीख कटोरा राजाजीने भेजो तो संटसंग मीरा हटकी।
ले चरणामृत पी गईं मीरा जैसी शीशी अमृतकी॥३॥
घरमेंसे एक दारा चली शीरपर घागर और मटकी।

जागो म्हांरा जगपतिरायक हंस बोलो क्यूं नहीं।।
हरि छो जी हिरदा माहिं पट खोलो क्यूं नहीं।।
तन मन सुरति संजो सीस चरणां धरूं।
जहां जहां देखूं म्हारो राम तहां सेवा करूं।।
सदकै करूं जी सरीर जुगै जुग वारणैं।
छोडी छोडी लिखूं सिलाम बहोत करि जानज्यौ।
बंदी हूं खानाजाद महरि करि मानज्यौ।।
हां हो म्हारा नाथ सुनाथ बिलम नहिं कीजिये।
मीरा चरणां की दासि दरस फिर दीजिये।।३।।

Mirabai Poems In Hindi

Names Of Mirabai Poems In Hindi

म्हारा ओलगिया घर आया जी।
तन की ताप मिटी सुख पाया हिल मिल मंगल गाया जी।।
घन की धुनि सुनि मोर मगन भया यूं मेरे आनंद छाया जी।
मग्न भ मिल प्रभु अपणा सूं भौका दरद मिटाया जी।।
चंद कूं निरखि कमोदणि फूलैं हरषि भया मेरे काया जी।
रग राग सीतल भ मेरी सजनी हरि मेरे महल सिधायाजी।।
सब भगतन का कारज कीन्हा सो प्रभु मैं पाया जी।
मीरा बिरहणि सीतल हो दुख दंद दूर नसाया जी।।१३।।
शब्दार्थ -ओलगिया परदेसी प्रियतम। घन की धुनि बादल की गरज।
भौ का दरद संसारी दुख। कमोदनि कुमुदिनी। सिधाया पधारा।
दंद द्वन्द्व झगडा। नसाया मेट दिया।

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List Of Mirabai Poems – Famous Poems Of Mirabai In Hindi Language

पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरू, किरपा कर अपनायो॥
जनम-जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।
खरच न खूटै चोर न लूटै, दिन-दिन बढ़त सवायो॥
सत की नाँव खेवटिया सतगुरू, भवसागर तर आयो।
‘मीरा’ के प्रभु गिरिधर नागर, हरख-हरख जस पायो॥

कहां गयोरे पेलो मुरलीवाळो
कहां गयोरे पेलो मुरलीवाळो। अमने रास रमाडीरे॥टेक॥
रास रमाडवानें वनमां तेड्या मोहन मुरली सुनावीरे॥१॥
माता जसोदा शाख पुरावे केशव छांट्या धोळीरे॥२॥
हमणां वेण समारी सुती प्रेहरी कसुंबळ चोळीरे॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर चरणकमल चित्त चोरीरे॥४॥

mirabai poetry in hindi

5 Poems Of Mirabai in Hindi

करुणा सुणो स्याम मेरी, मैं तो होय रही चेरी तेरी
करुणा(करणाँ) सुणो स्याम मेरी, मैं तो होय रही चेरी तेरी॥
दरसण कारण भई बावरी बिरह-बिथा तन घेरी।
तेरे कारण जोगण हूंगी, दूंगी नग्र बिच फेरी॥
कुंज बन हेरी-हेरी॥

अंग भभूत गले म्रिघछाला, यो तप भसम करूं री।
अजहुं न मिल्या राम अबिनासी बन-बन बीच फिरूं री॥
रोऊं नित टेरी-टेरी॥

जन मीरा कूं गिरधर मिलिया दुख मेटण सुख भेरी।
रूम रूम साता भइ उर में, मिट गई फेरा-फेरी॥
रहूं चरननि तर चेरी॥

हरी मेरे जीवन प्रान अधार।
और आसरो नाहीं तुम बिन तीनूं लोक मंझार।।
आप बिना मोहि कछु न सुहावै निरख्यौ सब संसार।
मीरा कहै मैं दासि रावरी दीज्यो मती बिसार।।४।।

थांने हम सब ही की चिंता तुम सबके हो गरीबनिवाज।।
सबके मुगट सिरोमणि सिरपर मानीं पुन्यकी पाज।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर बांह गहेकी लाज।।१।।

Poet Mirabai Poems in Hindi

मोती मूँगे उतार बनमाला पोई॥
अंसुवन जल सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई।
अब तो बेल फैल गई आणँद फल होई॥
दूध की मथनिया बडे प्रेम से बिलोई।
माखन जब काढि लियो छाछ पिये कोई॥
भगत देखि राजी हुई जगत देखि रोई।
दासी ‘मीरा लाल गिरिधर तारो अब मोही॥

बादल देख डरी हो, स्याम, मैं बादल देख डरी
श्याम मैं बादल देख डरी
काली-पीली घटा ऊमड़ी बरस्यो एक घरी
जित जाऊं तित पाणी पाणी हुई सब भोम हरी
जाके पिया परदेस बसत है भीजे बाहर खरी
मीरा के प्रभु गिरधर नागर कीजो प्रीत खरी
श्याम मैं बादल देख डरी

mirabai poems in hindi on krishna

Mirabai Poems In Hindi On Krishna – Mirabai Short Poems

आ सहेल्हां रली करां है पर घर गवण निवारि।।
झूठा माणिक मोतिया री झूठी जगमग जोति।
झूठा आभूषण री सांची पियाजी री प्रीति।।
झूठा पाट पटंबरा रे झूठा दिखडणी चीर।
सांची पियाजी री गूदडी जामें निरमल रहे सरीर।।
छपन भोग बुहाय देहे इण भोगन में दाग।
लूण अलूणो ही भलो है अपणे पियाजीरो साग।।
देखि बिराणे निवांणकूं है क्यूं उपजावे खीज।
कालर अपणो ही भलो है जामें निपजै चीज।।
छैल बिराणो लाखको है अपणे काज न होय।
ताके संग सीधारतां है भला न कहसी कोय।।
बर हीणो अपणो भलो है कोढी कुष्टी कोय।
जाके संग सीधारतां है भला कहै सब लोय।।
अबिनासीसूं बालबा हे जिनसूं सांची प्रीत।
मीरा कूं प्रभुजी मिल्या है ए ही भगतिकी रीत।।२।

जन मीरा कूं गिरधर मिलिया दुख मेटण सुख भेरी।
रूम रूम साता भइ उर में, मिट गई फेरा-फेरी॥
रहूं चरननि तर चेरी॥

हमारो प्रणाम बांकेबिहारी को।
मोर मुकुट माथे तिलक बिराजे कुंडल अलका कारी को।।
अधर मधुर पर बंसी बजावै रीझ रिझावै राधा प्यारी को।
यह छवि देख मगन भ मीरा मोहन गिरधर -धारी को।।१४।।

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Meerabai Famous Poems In Hindi – Short Hindi Poems By Meera Bai

कहाँ कहाँ जाऊं तेरे साथ, कन्हैया
कहाँ कहाँ जाऊं तेरे साथ, कन्हैया।।टेक।।
बिन्द्रावन की कुँज गलिन में, गहे लीनो मेरो हाथ।
दध मेरो खायो मटकिया फोरी, लीनो भुज भर साथ।
लपट झपट मोरी गागर पटकी, साँवरे सलोने लोने गात।
कबहुँ न दान लियो मनमोहन, सदा गोकल आत जात।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, जनम जनम के नाथ।।

प्रभुजी मैं अरज करुं छूं म्हारो बेड़ो लगाज्यो पार॥

इण भव में मैं दुख बहु पायो संसा-सोग निवार।
अष्ट करम की तलब लगी है दूर करो दुख-भार॥

यों संसार सब बह्यो जात है लख चौरासी री धार।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर आवागमन निवार॥

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