मातृभाषा पर कविता – हिन्दी भाषा पर कविता

मातृभाषा पर कविता

भारत में आज के समय में सबसे ज्यादा हिंदी भाषा बोली जाती हैं | प्राचीन काल में संस्कृत भारत की मात्रा भाषा थी पर अब पुरे भारत के 70 प्रतिशत लोग हिंदी बोलते और समझते हैं| हिंदी सिर्फ एक भाषा ही नहीं बल्कि दूसरो को समझने का जरिया हैं| आज के समय में कई विदेशी सैलानी भारत हिंदी सीखने होते हैं और बहुत से देशो में हिंदी एक विषय बन गया हैं| आज के इस पोस्ट में हम आपके लिए हिंदी भाषा पर कविता, poem for mother toung, मात्र भाषा पर काव्य आदि की जानकारी लाए हैं जिसका आप अपनी स्पीच और भाषण में इस्तमाल कर सकते हैं|

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Hindi Bhasha Par Hasya Kavita

हिन्दी मेरी भाषा है,
हिन्दी मेरी आशा है।
हिन्दी का उत्थान करना,
यही मेरी जिज्ञासा है।
हिन्दी की बोली अनमोल,
एक शब्द के कई विलोम।
हिन्दी हिन्द हिमालय पर शोभित,
हर्षित होते बोल के सोम।
मीठी बोली अद्भुत बाणी संग,
बढ़ती प्रेम पिपासा है।
हिन्दी का उत्थान करना,
यही मेरी जिज्ञासा है।
हिन्दी में सब काम करेंगे,
हिन्दी का ही नाम करेंगे।
हिन्दी सत्य वचन की देवी,
पथ-प्रदर्शक हम बनेंगे।
जग-मग ज्योति जले हिन्दी की,
यही कलम का ढांचा है।

अपना हर पल है हिंदीमय

अपना हर पल है हिंदीमय
अपना हर पल है
हिन्दीमय, एक दिवस क्या खाक मनाएँ?
बोलें-लिखें नित्य अंग्रेजी जो वे एक दिवस जय गाएँ
निज भाषा को
कहते पिछडी, पर भाषा उन्नत बतलाते
घरवाली से आँख फेरकर देख पडोसन को ललचाते
ऐसों की जमात में बोलो,
हम कैसे शामिल हो जाएँ?
हिंदी है दासों
की बोली, अंग्रेजी शासक की भाषा.
जिसकी ऐसी गलत सोच है, उससे क्या पालें हम आशा?
इन जयचंदों की खातिर
हिंदीसुत पृथ्वीराज बन जाएँ
ध्वनिविज्ञान-
नियम हिंदी के शब्द-शब्द में माने जाते
कुछ लिख, कुछ का कुछ पढने की रीत न हम हिंदी में पाते
वैज्ञानिक लिपि, उच्चारण भी
शब्द-अर्थ में साम्य बताएँ
अलंकार, रस, छंद
बिम्ब, शक्तियाँ शब्द की बिम्ब अनूठे
नहीं किसी भाषा में मिलते, दावे करलें चाहे झूठे
देश-विदेशों में हिन्दीभाषी
दिन-प्रतिदिन बढ़ते जाएँ
अन्तरिक्ष में
संप्रेषण की भाषा हिंदी सबसे उत्तम
सूक्ष्म और विस्तृत वर्णन में हिंदी है सर्वाधिक सक्षम
हिंदी भावी जग-वाणी है
निज आत्मा में ‘सलिल’ बसाएँ
आचार्य संजीव सलिल

अपनेपन की चली हवाएँ

अपने पन की चली हवाएँ, हिन्दी के शृंगार से।
हिन्दी के स्वर बुला रहे हैं, सात समन्दर पार से।।
आज विश्व में हिन्दी के प्रति,
बढ़ने लगा लगाव है।
एक मात्र भाषा है जिसमें,
सर्वधर्म समभाव है।।
हिन्दी इतनी सहज कि इसको सब अपनाते प्यार से।
हिन्दी के स्वर बुला रहे हैं सात समन्दर पार से।।
सकल विश्व साहित्य आजकल,
हिन्दी में उपलब्ध हैं।
हिन्दी के बढ़ते प्रचलन से,
हर भाषा स्तब्ध है।।
प्रगति पंथ पर देश चला है हिन्दी के विस्तार से।
हिन्दी के स्वर बुला रहे हैं सात समन्दर पार से।।
वही देश उन्नत होता है,
जिसकी भाषा एक हो।
उसको जग सम्मानित करता,
जिसके पास विवेक हो।।
अनजाने अपने हो जाते हिन्दी के व्यवहार से।
हिन्दी के स्वर बुला रहे हैं सात समन्दर पार से।।
कई सितारे चमक रहे हैं,
हिन्दी के आकाश में।
छटा इन्द्रधनुषी बिखरी है,
इसके मृदुल प्रकाश में।।
जग को ज्ञान ज्योति मिलती है हिन्दी के भंडार से।
हिन्दी के स्वर बुला रहे हैं सात समन्दर पार से।।

हिन्दी दिवस पर हास्य कविता

सरल कविताएँ

संस्कृत की एक लाड़ली बेटी है ये हिन्दी।
बहनों को साथ लेकर चलती है ये हिन्दी।
सुंदर है, मनोरम है, मीठी है, सरल है,
ओजस्विनी है और अनूठी है ये हिन्दी।
पाथेय है, प्रवास में, परिचय का सूत्र है,
मैत्री को जोड़ने की सांकल है ये हिन्दी।
पढ़ने व पढ़ाने में सहज है, ये सुगम है,
साहित्य का असीम सागर है ये हिन्दी।
तुलसी, कबीर, मीरा ने इसमें ही लिखा है,
कवि सूर के सागर की गागर है ये हिन्दी।
वागेश्वरी का माथे पर वरदहस्त है,
निश्चय ही वंदनीय मां-सम है ये हिंदी।
अंग्रेजी से भी इसका कोई बैर नहीं है,
उसको भी अपनेपन से लुभाती है ये हिन्दी।
यूं तो देश में कई भाषाएं और हैं,
पर राष्ट्र के माथे की बिंदी है ये हिन्दी।

National Language Hindi Poetry

हमारी मातृभाषा
लुप्त हो रही है
है गहरी निराशा।
चारों ओर पश्चिमी सभ्यताओं के जोर
छा जाएगा अंधेरा कैसे होगी भोर।
कभी नाचते थे मोर, मिश्री घोलती थी मधुर तान,
अब हर तरफ किस रहे हैं चकाचौंध और शोर।
हिन्दी गानों में भी अंग्रेजी के बोल
हमारी मातृभाषा में जहर रहे है घोल।
नारियों में साड़ियों की पहले थी प्रधानता,
जिन्स और चूड़ीदार के अब बज रहे हैं ढ़ोल।
स्त्रीयों में पहले होती थी लाज
अर्धनंगी औरतें अब पहन रही है ताज।
बुन्द भर शराब से हम कोसों थे दूर
हर वर्ग अब समाज का है नशे में चूर
भारत माता के ललाट की चमक खो रही है बिन्दी,
हमारे ही देश में अब रो रही है हिन्दी।

Hindi Ki Sthiti Par Kavita

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।
उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।
निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय
लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय।
इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।
और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।
तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय
यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।
भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।
सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।

हिन्दी भाषा के ऊपर कविता

दादा दादी नाना नानी की कहानियां इसमें ही बसती थीं
मां की लोरी भी तो इसी भाषा में ही कानों में पड़ती थी
जिसको सुनकर मैं सपनों में खो जाता था
और कुछ लम्हों का सही, शहजादा हो जाता था
तभी सोच लिया मैंने राजभाषा को सम्मान दिलाऊंगा
हिन्दी की व्यथा को आप सभी तक पहुंचाऊंगा
आओ हम सब मिलकर हिंदी को कंठ में बसायें
मातृभाषा पर गर्व करें, गौरवमान बढ़ायें
संकल्प लें कि हिंदी को चहूं ओर फैलायेंगे
पूरे देश में गर्व से हिंदी का परचम लहरायेंगे
बदल देंगे वर्तमान को अंग्रेजी तो क्या चीज है
बच्चे बच्चे में हिंदी के प्रति अपनापन जगायेंगे
यही विनती मैं आपसे पुनः करता हूँ
हिंदी के जख्मों में मरहम भरता हूँ
हिंदी है मेरे वतन की शान बता रहा हूँ
हिंदी है सर्वोपरि पुनः समझा रहा हूँ

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हिंदी भाषा की मूल पर कविता

भाल की शृंगार
माँ भारती के भाल की शृंगार है हिंदी
हिंदोस्ताँ के बाग़ की बहार है हिंदी
घुट्टी के साथ घोल के माँ ने पिलाई थी
स्वर फूट पड़ रहा, वही मल्हार है हिंदी
तुलसी, कबीर, सूर औ’ रसखान के लिए
ब्रह्मा के कमंडल से बही धार है हिंदी
सिद्धांतों की बात से न होयगा भला
अपनाएँगे न रोज़ के व्यवहार में हिंदी
कश्ती फँसेगी जब कभी तूफ़ानी भँवर में
उस दिन करेगी पार, वो पतवार है हिंदी
माना कि रख दिया है संविधान में मगर
पन्नों के बीच आज तार-तार है हिंदी
सुन कर के तेरी आह ‘व्योम’ थरथरा रहा
वक्त आने पर बन जाएगी तलवार ये हिंदी

मातृभाषा हिंदी पर कविता

हिन्दी दिवस पर हास्य कविता

बात हिंदी की सही थी, शर्म तो हमें भी नहीं आती
हर वर्ष हिंदी दिवस मनाते हैं पर अंग्रेजी कहीं नहीं जाती
आम बात करने में हिंदी बोलते हिचकिचाते हैं
हिंदी को पराया कर अंग्रेजी को गले लगाते हैं
फिर सोचा नया दौर है हर तरफ अंग्रेजी का शोर है
आधुनिक समाज में जीते हैं हर तरफ दिखावे का जोर है
आज के दौर में जिसने पैदा किया उसकी याद नहीं आती
ऐसे में मातृभाषा को भूल जायें, कौन सा अपराध घोर है
पर सच कहूं तो मैं मन ही मन परेशान हो गया
मुझसे हिंदी का कहीं न कहीं तो अपमान हो गया
अरे यही वो भाषा है जिसको बोलकर बड़ा हुआ
बचपन की शिक्षा का आरम्भ भी तो इससे ही हुआ

हमारी मातृभाषा हिंदी

आज हिंदी दिवस पर मुझे फिर विचार आया
मातृ भाषा से मिल आऊं भले ही उन्होंने नहीं बुलाया
व्यथा तो उनको, मुझसे बहुत-सी होगी
डरते डरते मैंने हिंदी का दरवाजा खटखटाया
मिला तो हिंदी ने प्यार से बिठाया
दर्द अपना कुछ इस तरह सुनाया
बोली वैसे तो तू साल में एक बार आता है
कुछ करता भी है या दिखावे को हिंदी दिवस मनाता है।
मैंने कहा हिंदी दिवस तो हम सम्मान से मनाते हैं
ऐसा दिन होता है जहां सभी आपके गुणगान गाते हैं
हिंदी एक बनावटी हंसी के साथ मेरी ओर मुस्कुराई
बयां करते हुए अपने दर्द को पूरी दासतां सुनाई
कहा, क्या पूरे वर्ष में तुम्हें एक ही दिन मेरे लिए मिलता है
बाकी दिनों में तो अंग्रेजी के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखता हैं
अब तो अपने ही देश में एक दिन की मेहमान हो गयी हूं
धीरे धीरे अपने ही बच्चों में अल्पज्ञान हो गयी हूं।

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