मकर संक्रांति पर कविता | Poem on Makar Sankranti In Hindi

Makar Sankranti Par Kavita | पोएम ऑन मकर संक्रांति इन हिंदी : मकर संक्रांति हिन्दू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक त्यौहार है इस दिन सभी लोगो के घर में तिल से बनी हुई मिठाईयाँ बनती है व वह मिठाईयाँ लोग अपने रिश्तेदारों व दोस्तों को बांटते है | इस दिन सभी लोग पतंगबाजी का आयोजन भी करते है व पतंग उड़ाते है इसीलिए हम आपको मकर संक्रांति के ऊपर कुछ बेहतरीन कविताये क्लास 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11 व 12 हर भाषा जैसे संस्कृत, हिंदी, मराठी, गुजराती, बंगाली, ओड़िआ, पंजाबी, कन्नड़ व तेलगु जैसी भाषा में जानने के लिए हमारे द्वारा बताई गयी इस जानकारी को पढ़ सकते है |

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पतंग पर कविता इन हिंदी

Patang Par Kavita In Hindi : भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मकर संक्रांति के ऊपर कुछ बेहतरीन कविता लिखी गयी है जो की नीचे आप पढ़ सकते है इसके अलावा आप मकर संक्रांति जैसे पर्व, त्यौहार या फेस्टिवल पर महान कवि सुमित्रानन्द पंत द्वारा लेटेस्ट कविता जान सकते है :

उत्सव, पतंग
मेरे लिए उर्ध्वगति का उत्सव
मेरा सूर्य की ओर प्रयाण।
पतंग
मेरे जन्म-जन्मांतर का वैभव,
मेरी डोर मेरे हाथ में
पदचिह्न पृथ्वी पर,
आकाश में विहंगम दृश्य।
मेरी पतंग
अनेक पतंगों के बीच…
मेरी पतंग उलझती नहीं,
वृक्षों की डालियों में फंसती नहीं।
पतंग
मानो मेरा गायत्री मंत्र।
धनवान हो या रंक,
सभी को कटी पतंग एकत्र करने में आनंद आता है,
बहुत ही अनोखा आनंद।
कटी पतंग के पास
आकाश का अनुभव है,
हवा की गति और दिशा का ज्ञान है।
स्वयं एक बार ऊंचाई तक गई है,
वहां कुछ क्षण रुकी है।
पतंग
मेरा सूर्य की ओर प्रयाण,
पतंग का जीवन उसकी डोर में है।
पतंग का आराध्य(शिव) व्योम(आकाश) में,
पतंग की डोर मेरे हाथ में,
मेरी डोर शिव जी के हाथ में।
जीवन रूपी पतंग के लिए(हवा के लिए)
शिव जी हिमालय में बैठे हैं।
पतंग के सपने(जीवन के सपने)
मानव से ऊंचे।
पतंग उड़ती है,
शिव जी के आसपास,
मनुष्य जीवन में बैठा-बैठा,
उसकी डोर को सुलझाने में लगा रहता है।

सूरज ने मकर राशि में दाखिल होकर
मकर संक्रांति के आने की दी खबर
ईंटों के शहर में
आज बहुत याद आया अपना घर.
गन्ने के रस के उबाल से फैलती हर तरफ
सोंधी-सोंधी वो गुड की वो महँक
कूटे जाते हुए तिल का वो संगीत
साथ देते बेसुरे कंठों का वो सुरीला गीत.
गंगा स्नान और खिचड़ी का वो स्वाद,
रंगीन पतंगों से भरा आकाश
जोश भरी “वोक्काटा” की गूँज
सर्दियों को अलविदा कहने की धूम.
अब तुम्हारा साथ ही त्यौहार जैसा लगता है
तुम्हारे आँखों की चमक दीवाली जैसी
और प्यार के रंगों में होली दिखती है
तुम्हारे गालों का वो काला तिल
जब तुम्हारे होठों के गुड की मिठास में घुलता है
वही दिन मकर-संक्रांति का होता है!
वही दिन मकर-संक्रांति का होता है!!

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Short Poem On Patang In Hindi

आसमान में चली पतंग मन में उठी एक तरंग
लाल, गुलाबी, काली, नीली,
मुझको तो भाती है पीली
डोर ना इसकी करना ढीली
सर-सर सर-सर चल सुरीली
कभी इधर तो कभी उधर
लहराती है फर फर फर।

ऐसी एक पतंग बनाएं
जो हमको भी सैर कराए
कितना अच्छा लगे अगर
उड़े पतंग हमें लेकर
पेड़ों से ऊपर पहुंचे
धरती से अंबर पहुंचे
इस छत से उस छत जाएं
आसमान में लहराएं
खाती जाए हिचकोले
उड़न खटोले-सी डोले
डोर थामकर डटे रहें
साथ मित्र के सटे रहें
विजय पताका फहराएं
हम भी सैर कर आएं

Kite Makar Sankranti Kids World

आज का दिन है अति पावन
मकर संक्रांति का है दिन
आज उड़ेगी आकाश में पतंग
होंगे लाल पिले सब रंग
गंगा में डुबकी लगाओ
करो शीतल तन और मन
दान करो चीनी चावल धान
कमाओ पुण्या बनाओ परमार्थ
जोड़ो हाथ ईशवर से वर माँगो
सब जन जीवन का हो कल्याण

आओ हम सब मकर संक्रांति मनाये
तिल की लड्डू सब मिलकर खाये।
घर में हम सब खुशियाँ फैलाये
पतंगे हम खूब उड़ाये।
सब मिलकर हम नाचे गाये
मौज मस्ती खूब उड़ाये।
आओ हम सब मकर संक्रांति मनाये
तिल की लड्डू सब मिलकर खाये।
गली मोहल्ले मे बांटे सारे ।
सब मिलकर कर खाये प्यारे
गंगा में डूबकी लगाये ।
शरीर अपना स्वस्थ बनाये ।
आओ हम सब मकर संक्रांति मनाये
तिल की लड्डू सब मिलकर खाये।।

मकर संक्रांति पर कविता

Lines On Patang In Hindi

मकर राशि पर सूर्य जब, आ जाते है आज !
उत्तरायणी पर्व का, हो जाता आगाज !!
कनकअौं की आपने,ऐसी भरी उड़ान !
आसमान मे हो गये , पंछी लहू लुहान !!
फिरकी फिरने लग गई, उड़ने लगी पतंग !
कनकअौं की छिड़ गई, आसमान मे जंग !!
अनुशासित हो कर लडें,लडनी हो जो जंग !
कहे डोर से आज फिर , उडती हुई पतंग !!
कहने को तो देश में,अलग अलग है प्रान्त !
कहीं कहें पोंगल इसे , कहे कहीं सक्रांत !!
उनका मेरा साथ है, जैसे डोर पतंग !
जीवन के आकाश मे, उडें हमेशा संग !!
मना लिया कल ही कहीं,कही मनायें आज !
त्योंहारो के हो गये, अब तो अलग मिजाज !!
त्योहारों में धुस गई, यहांँ कदाचित भ्राँति !
दो दिन तक चलती रहे, देखो अब संक्राँति !

आसमान का मौसम बदला
बिखर गई चहुँओर पतंग।
इंद्रधनुष जैसी सतरंगी
नील गगन की मोर पतंग।।
मुक्त भाव से उड़ती ऊपर
लगती है चितचोर पतंग।
बाग तोड़कर, नील गगन में
करती है घुड़दौड़ पतंग।।
पटियल, मंगियल और तिरंगा
चप, लट्‍ठा, त्रिकोण पतंग।
दुबली-पतली सी काया पर
लेती सबसे होड़ पतंग।।
कटी डोर, उड़ चली गगन में
बंधन सारे तोड़ पतंग।
लहराती-बलखाती जाती
कहाँ न जाने छोर पतंग।।

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Hindi Poem On Kite Festival

मकर संक्रांति का त्यौहार,
पुरे भारत में मनाया जाता है।
कहीं लोहड़ी तो कहीं पोंगल,
कहीं संक्रांति का त्यौहार।
बड़ा ही पावन और पवित्र,
होता यह त्यौहार।
दान धर्म और पूजा पाठ,
से होता इसका सरोकार।
इस दिन सभी लोग ,
करते है पूजा पाठ।
दही चुरा, लड़ुआ तिलकुट,
सब खाते मिल बाँट।
सभी मिलकर उड़ाते पतंग,
बच्चे हो या बड़े।
कहीं नीली तो कहीं पिली
आसमान में लहराती पतंग
बच्चों के मन को भाती पतंग।
नाम-ममता रानी,राधानगर (बाँका)

हुए सूर्य संक्रमित
आई फिर संक्रान्ति
देने नया उत्साह
भरने नया हर्ष
मन में कृषक के।
उड़ेंगे पतंग
ले जाएंगे अपने साथ
कृषक की तमाम अर्ज़ियाँ
सूर्य के पास
जितना ऊँचा उठेंगे पतंग
उतना ही बढ़ेगा उत्साह कृषक का।
जब कभी हतोत्साहित होगा कृषक
तो पुकारेगी पतंग
ठहरो कृषक!
करो तैयारी आएगा नया वर्ष
जब पुनः करोगे गान
होगा स्वर्ण विहान
करो तैयारी फिर से
नया बीज बोने की।

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पतंग कविता मराठी

आई लेकर नव विहान देखो प्यारी आई संक्रांति
और समेटे जीवन धन की कितनी ही ये निर्मल शांति।
कृषक खिल उठे, महका जीवन, तिल की, गुड़ की ख़ुशबू से
हुआ संचरित नव उत्साह, नवल सूर्य के जादू से।
चले डोर संग व्योम भेदने और सजाने ज्यों विहंग
बच्चे दौड़े लेकर हाथों-हाथों में सुंदर पतंग।
बीजेंगे अब कृषक बीज और लाएंगे फिर जीवन क्रांति
आई लेकर नव विहान देखो प्यारी आई संक्रांति।

सूर्य जाता है जब दूसरी राशि में
तब क्यों खुश हो जाता है किसान इतना
कि उड़ने लगते हैं पतंग
छाने लगती है खुशबू घी की चारों ओर
रंग फैलने लगते हैं इधर-उधर।
क्यों किसान सोचता है कि
संक्रमित होना सूर्य का शुभ होगा
उनके लिये उनके बीजे हुए बीजों के लिये।
क्या नहीं जानता किसान कि
नहीं बदलतीं ऋतुएँ किसानों के लिये
सूर्य नहीं होते संक्रमित किसानों के लिये
बल्कि उन्हें जाना होता है सिर्फ मकर राशि में
खत्म होना होता है सर्दियों का
किसानों का कोई हेतु नहीं होता इसमें
लेकिन खुश होेता है किसान।
नदी अपना पानी नहीं पीती
पेड़ अपने फल नहीं खाते
किसान उपजाते हैं अन्न खुद के लिये नहीं
बल्कि इसलिये कि
अगली बार फिर आए संक्रांति
फिर हो सूर्य संक्रमित
जाए दूसरी राशि में
और उड़ें पतंग
महके तिल-मूंगफली की खुशबू चारों ओर।

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