पर्यावरण पर कविता – Hindi Poetry on Environment

पर्यावरण पर कविता

paryavaran par kavita  – paryavaran divas par kavita : हमारी पूरी धरती पर जो चीज़ सबसे जरुरी हैं और जिसका हमे सबसे ज्यादा ध्यान रखना चाहिए वो चीज़ प्रकृति या पर्यावरण हैं| इससे ही हमे खाने को भोजन, पीने को पानी और सोने के लिए घर मिलता हैं| पर्यावरण की वजह से ही इंसान का वजूद हैं| अगर पर्यावरण ही नहीं रहेगा तो मानव जीवन का कोई मतलब ही नहीं रहेगा| इसी कारण वश हमे हमारी प्रकृति और पर्यावरण का ध्यान रखना चाहिए | यह हम सब की जिम्मेदारी हैं की हम अपने आस पास के पर्यावरण को दूषित होने से रुके|

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पर्यावरण संरक्षण पर कविता

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रो-रोकर पुकार रहा हूं,
हमें जमीं से मत उखाड़ो।
रक्तस्राव से भीग गया हूं मैं,
कुल्हाड़ी अब मत मारो।
आसमां के बादल से पूछो,
मुझको कैसे पाला है।
हर मौसम में सींचा हमको,
मिट्टी-करकट झाड़ा है।
उन मंद हवाओं से पूछो,
जो झूला हमें झुलाया है।
पल-पल मेरा ख्याल रखा है,
अंकुर तभी उगाया है।
तुम सूखे इस उपवन में,
पेड़ों का एक बाग लगा लो।
रो-रोकर पुकार रहा हूं,
हमें जमीं से मत उखाड़ो।
इस धरा की सुंदर छाया,
हम पेड़ों से बनी हुई है।
मधुर-मधुर ये मंद हवाएं,
अमृत बन के चली हुई हैं।
हमीं से नाता है जीवों का,
जो धरा पर आएंगे।
हमीं से रिश्ता है जन-जन का,
जो इस धरा से जाएंगे।
शाखाएं आंधी-तूफानों में टूटीं,
ठूंठ आंख में अब मत डालो।
रो-रोकर पुकार रहा हूं,
हमें जमीं से मत उखाड़ो।
हमीं कराते सब प्राणी को,
अमृत का रसपान।
हमीं से बनती कितनी औषधि।
नई पनपती जान।
कितने फल-फूल हम देते,
फिर भी अनजान बने हो।
लिए कुल्हाड़ी ताक रहे हो,
उत्तर दो क्यों बेजान खड़े हो।
हमीं से सुंदर जीवन मिलता,
बुरी नजर मुझपे मत डालो।
रो-रोकर पुकार रहा हूं,
हमें जमीं से मत उखाड़ो।
अगर जमीं पर नहीं रहे हम,
जीना दूभर हो जाएगा।
त्राहि-त्राहि जन-जन में होगी,
हाहाकार भी मच जाएगा।
तब पछताओगे तुम बंदे,
हमने इन्हें बिगाड़ा है।
हमीं से घर-घर सब मिलता है,
जो खड़ा हुआ किवाड़ा है।
गली-गली में पेड़ लगाओ,
हर प्राणी में आस जगा दो।
रो-रोकर पुकार रहा हूं,
हमें जमीं से मत उखाड़ो।

पर्यावरण प्रदूषण पर कविता

विश्व पर्यावरण दिवस पर कविता

बहुत लुभाता है गर्मी में,
अगर कहीं हो बड़ का पेड़।
निकट बुलाता पास बिठाता
ठंडी छाया वाला पेड़।
तापमान धरती का बढ़ता
ऊंचा-ऊंचा, दिन-दिन ऊंचा
झुलस रहा गर्मी से आंगन
गांव-मोहल्ला कूंचा-कूंचा।
गरमी मधुमक्खी का छत्ता
जैसे दिया किसी ने छेड़।
आओ पेड़ लगाएं जिससे
धरती पर फैले हरियाली।
तापमान कम करने को है
एक यही ताले की ताली
ठंडा होगा जब घर-आंगन
तभी बचेंगे मोर-बटेर
तापमान जो बहुत बढ़ा तो
जीना हो जाएगा भारी
धरती होगी जगह न अच्‍छी
पग-पग पर होगी बीमारी
रखें संभाले इस धरती को
अभी समय है अभी न देर।

विश्व पर्यावरण दिवस पर कविता

करके ऐसा काम दिखा दो, जिस पर गर्व दिखाई दे।
इतनी खुशियाँ बाँटो सबको, हर दिन पर्व दिखाई दे।
हरे वृक्ष जो काट रहे हैं, उन्हें खूब धिक्कारो,
खुद भी पेड़ लगाओ इतने, धरती स्वर्ग दिखाई दे।।
करके ऐसा काम दिखा दो…
कोई मानव शिक्षा से भी, वंचित नहीं दिखाई दे।
सरिताओं में कूड़ा-करकट, संचित नहीं दिखाई दे।
वृक्ष रोपकर पर्यावरण का, संरक्षण ऐसा करना,
दुष्ट प्रदूषण का भय भू पर, किंचित नहीं दिखाई दे।।
करके ऐसा काम दिखा दो…
हरे वृक्ष से वायु-प्रदूषण का, संहार दिखाई दे।
हरियाली और प्राणवायु का, बस अम्बार दिखाई दे।
जंगल के जीवों के रक्षक, बनकर तो दिखला दो,
जिससे सुखमय प्यारा-प्यारा, ये संसार दिखाई दे।।
करके ऐसा काम दिखा दो…
वसुन्धरा पर स्वास्थ्य-शक्ति का, बस आधार दिखाई दे।
जड़ी-बूटियों औषधियों की, बस भरमार दिखाई दे।
जागो बच्चो, जागो मानव, यत्न करो कोई ऐसा,
कोई प्राणी इस धरती पर, ना बीमार दिखाई दे।।
करके ऐसा काम दिखा दो…

पर्यावरण पर छोटी कविता

कितने प्यार से किसी ने
बरसों पहले मुझे बोया था
हवा के मंद मंद झोंको ने
लोरी गाकर सुलाया था ।
कितना विशाल घना वृक्ष
आज मैं हो गया हूँ
फल फूलो से लदा
पौधे से वृक्ष हो गया हूँ ।
कभी कभी मन में
एकाएक विचार करता हूँ
आप सब मानवों से
एक सवाल करता हूँ ।
दूसरे पेड़ों की भाँति
क्या मैं भी काटा जाऊँगा
अन्य वृक्षों की भाँति
क्या मैं भी वीरगति पाउँगा ।
क्यों बेरहमी से मेरे सीने
पर कुल्हाड़ी चलाते हो
क्यों बर्बरता से सीने
को छलनी करते हो ।
मैं तो तुम्हारा सुख
दुःख का साथी हूँ
मैं तो तुम्हारे लिए
साँसों की भाँति हूँ।
मैं तो तुम लोगों को
देता हीं देता हूँ
पर बदले में
कछ नहीं लेता हूँ ।
प्राण वायु देकर तुम पर
कितना उपकार करता हूँ
फल-फूल देकर तुम्हें
भोजन देता हूँ।
दूषित हवा लेकर
स्वच्छ हवा देता हूँ
पर बदले में कुछ नहीं
तुम से लेता हूँ ।
ना काटो मुझे
ना काटो मुझे
यही मेरा दर्द है।
यही मेरी गुहार है।
यही मेरी पुकार है।

पर्यावरण पर बाल कविता

पर्यावरण प्रदूषण पर कविता

भारत को स्वच्छ बनाना है
भारत को ऊँचा उठाना है
हम सबको ही मिल करके
सम्भव हर यत्न करके
बीडा़ यही उठाना है
भारत को स्वच्छ बनाना है
भारत को ऊँचा उठाना है
होगा जब ये भारत स्वच्छ
सब जन होंगे तभी स्वस्थ
सबको यही समझाना है
भारत को स्वच्छ बनाना है
भारत को ऊँचा उठाना है
गंगा माँ के जल को भी
यमुना माँ के जल को भी
मोती सा फिर चमकाना है
भारत को स्वच्छ बनाना है
भारत को ऊँचा उठाना है
आओ मिल कर करें संकल्प
होना मन में कोइ विकल्प
गन्दगी को दूर भगाना है
भारत को स्वच्छ बनाना है
भारत को ऊँचा उठाना है
देश को विकसित करने का
जग में उन्नति बढ़ाने का
नई नीति सदा बनाना है
भारत को स्वच्छ बनाना है
भारत को ऊँचा उठाना है
हम सबको ही मिल करके
हर बुराई को दूर करके
आतंकवाद को भी मिटाना है
भारत को स्वच्छ बनाना है
भारत को ऊँचा उठाना है
मानवता को दिल में रखके
धर्म का सदा आचरण करके
देश से कलह मिटाना है
भारत को स्वच्छ बनाना है
भारत को ऊँचा उठाना है
सत्य अहिंसा न्याय को लाकर
सबके दिल में प्यार जगाकर
स्वर्ग को धरा पर लाना है
भारत को स्वच्छ बनाना है
भारत को ऊँचा उठाना है

Paryavaran Par Kavita In Hindi

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बहुत लुभाता है गर्मी में,
अगर कहीं हो बड़ का पेड़।
निकट बुलाता पास बिठाता
ठंडी छाया वाला पेड़।
तापमान धरती का बढ़ता
ऊंचा-ऊंचा, दिन-दिन ऊंचा
झुलस रहा गर्मी से आंगन
गांव-मोहल्ला कूंचा-कूंचा।

पर्यावरण बचाओ पर कविता

पर्यावरण संरक्षण पर कविता

पर्यावरण को बचाना हमारा ध्येय हो
सबके पास इसके लिए समय हो
पर्यावरण अगर नहीं रहेगा सुरक्षित
हो जायेगा सबकुछ दूषित
भले ही आप पेड़ लगाये एक
पूरी तरह करे उसकी देखरेख
सौर उर्जा का करे सब उपयोग
कम करे ताप विद्युत् का उपभोग
रासायनिक खाद का कम करे छिडकाव
भूमि को प्रदूषित होने से बचाव
कचड़ो का समुचित रीती से करो निपटारा
फैक्ट्रियो में जब सौर यन्त्र लगाई जाएँगी
वायु प्रदुषण में अपने आप कमी आएँगी
तब जाकर पर्यावरण प्रदुषण में कमी आएँगी
आधी बीमारिया अपने आप चली जाएगी

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पर्यावरण सुरक्षा पर कविता

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प्रकृति ने अच्छा दृश्य रचा
इसका उपभोग करें मानव।
प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करके
हम क्यों बन रहे हैं दानव।
ऊँचे वृक्ष घने जंगल ये
सब हैं प्रकृति के वरदान।
इसे नष्ट करने के लिए
तत्पर खड़ा है क्यों इंसान।
इस धरती ने सोना उगला
उगलें हैं हीरों के खान
इसे नष्ट करने के लिए
तत्पर खड़ा है क्यों इंसान।
धरती हमारी माता है
हमें कहते हैं वेद पुराण
इसे नष्ट करने के लिए
तत्पर खड़ा है क्यों इंसान।
हमने अपने कूकर्मों से
हरियाली को कर डाला शमशान
इसे नष्ट करने के लिए
तत्पर खड़ा है क्यों इंसान।

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