स्वतंत्रता पर कविता | स्वतंत्रता पर कविताएं इन हिंदी

स्वतंत्रता पर कविता | स्वतंत्रता पर कविताएं इन हिंदी

स्वतंत्रता पर कविता : जैसा की आपको पता है की 15 अगस्त जो की हमारा स्वन्त्रता दिवस है इस दिन हमारा देश भारत ब्रिटिश शासन से आज़ाद हुआ जिसके लिये हमारे देशभक्तोस्वतंत्रता सेनानियो द्वारा  द्वारा दिए गए बलिदान के ऊपर कुछ महापुरुषों द्वारा कही गयी कुछ शायरिया, स्वतंत्रता दिवस पर बाल कविता और कविताये जो हमारे देश की महानता को दर्शाती है वो हम आज आपको बताएंगे |

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स्वतंत्रता पर कविताएं इन हिंदी

ये कैसी आज़ादी है ,
हर तरफ बर्बादी है ,
कही दंगे तो कही फसाद है ,
कही जात पात तो कही ,
छुवा छूत की बीमारी है |
हर जगह नफरत ही नफरत ,
तो कही दहशत के अंगारे है
क्या नेता क्या वर्दी वाले ,
सभी इसके भागीदारी है .

“हम तो आज़ाद हुए लड़कर पर
आज़ादी के बाद भी लड़ रहे है
पहले अंग्रेजो से लड़े थे
अब अपनों से लड़ रहे है
आज़ादी से पहले कितने
ख्वाब आँखों में संजो रखे थे
अब आजादी के बाद वो
ख्वाब ,ख्वाब ही रह गए है
अब तो अंग्रेज़ी राज और
इस राज में फर्क न लगे
पहले की वह बद स्थिति
अब बदतर हो गई है”

“कर गयी पैदा तुझे उस कोख का एहसान है
सैनिकों के रक्त से आबाद हिन्दुस्तान है
तिलक किया मस्तक चूमा बोली ये ले कफन तुम्हारा
मैं मां हूं पर बाद में, पहले बेटा वतन तुम्हारा
धन्य है मैया तुम्हारी भेंट में बलिदान में
झुक गया है देश उसके दूध के सम्मान में
दे दिया है लाल जिसने पुत्र मोह छोड़कर
चाहता हूं आंसुओं से पांव वो पखार दूं
ए शहीद की मां आ तेरी मैं आरती उतार लूं”

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15 अगस्त की कविताये

“पंद्रह अगस्त का दिन कहता –
आज़ादी अभी अधूरी है।
सपने सच होने बाकी है,
रावी की शपथ न पूरी है”

“जिनकी लाशों पर पग धर कर
आज़ादी भारत में आई।
वे अब तक हैं खानाबदोश
ग़म की काली बदली छाई”

“कलकत्ते के फुटपाथों पर
जो आँधी-पानी सहते हैं।
उनसे पूछो, पंद्रह अगस्त के
बारे में क्या कहते हैं”

“हिंदू के नाते उनका दु:ख
सुनते यदि तुम्हें लाज आती।
तो सीमा के उस पार चलो
सभ्यता जहाँ कुचली जाती”

यह भी देखें: गणतंत्र दिवस पर छोटी कविता

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स्वन्त्रता दिवस पर कविताये

“इंसान जहाँ बेचा जाता,
ईमान ख़रीदा जाता है।
इस्लाम सिसकियाँ भरता है,
डालर मन में मुस्काता है”

“डालर मन में मुस्काता है।।
भूखों को गोली नंगों को
हथियार पिन्हाए जाते हैं।
सूखे कंठों से जेहादी
नारे लगवाए जाते हैं”

“लाहौर, कराची, ढाका पर
मातम की है काली छाया।
पख्तूनों पर, गिलगित पर है
ग़मगीन गुलामी का साया”

“दिन दूर नहीं खंडित भारत को
पुन: अखंड बनाएँगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक
आज़ादी पर्व मनाएँगे”

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