इमरान प्रतापगढ़ी शायरी | Imran Pratapgarhi Shayari

इमरान प्रतापगढ़ी शायरी

इमरान प्रतापगढ़ी शायरी : इमरान प्रतापगढ़ी इस आधुनिक समय के महानतम शायरों में से एक हैं | वे न सिर्फ राजनीतिक हालातो पर शायरी करते हैं बल्कि उन्होंने कई मशहूर व देश विदेश में मानी हुई लव शायरी ,हिंदी सैड शायरी व कविता भी लिखी हैं | इमरान प्रतापगढ़ी को उनके कटाक्ष व व्यंग्य शायरियो के लिए भी बहुत प्रसिद्धि मिली है | तो आइये आज हम आपको उन्ही कुछ मशहूर व सर्वश्रेष्ठ शायरियाँ बताते हैं |

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इमरान प्रतापगढ़ी शायरी

  • ज़माने पर भरोसा करने वालों,
    भरोसे का ज़माना जा रहा है !
    तेरे चेहरे में एैसा क्या है आख़िर,
    जिसे बरसों से देखा जा रहा है !!!
  • राह में ख़तरे भी हैं, लेकिन ठहरता कौन है,
    मौत कल आती है, आज आ जाये डरता कौन है !
    तेरी लश्कर के मुक़ाबिल मैं अकेला हूँ मैं मगर,
    फ़ैसला मैदान में होगा कि मरता कौन है !!!
  • ख़बसूरत मौसम, हर चीज़ कुहरे में लिपटी हुई
    गुमनाम सा सफ़र, अजनबी रास्ते
    शुक्रिया अपने बंजारेपन का
  • उनके हिस्से में किले मेरे, हिस्से में छप्पर में आते हैं….!
    अफ़सोस मगर आतंक के हर, इलज़ाम मेरे सर आते हैं….!!

इमरान प्रतापगढ़ी मुशायरा

इमरान प्रतापगढ़ी की मशहूर शायरियां

  • हमने उसके जिस्म को फूलों की वादी कह दिया।
    इस जरा सी बात पर हमको फंसादी कह दिया,
    हमने अकबर बनकर जोधा से मोहब्बत की।
    मगर सिरफिरे लोगों ने हमको लव जिहादी कह दिया |
  • ये ताजमहल ये लालकिला, ये जितनी भी तामीरें हैं,
    जिन पर इतराते फिरते हो, सब पुरखों की जागीरें हैं!!
    जब माँगा वतन ने खून, बदन का सारा लहू निचोड़ दिया,
    अफ़सोस मगर इतिहास ने ये, किस मोड़ पे लाके छोड़ दिया !!

इमरान प्रतापगढ़ी कविता

कोई ला के दे दे मुझे लाल मेरा 

सुना था कि बेहद सुनहरी है दिल्ली,
समंदर सी ख़ामोश गहरी है दिल्ली

मगर एक मॉं की सदा सुन ना पाये,
तो लगता है गूँगी है बहरी है दिल्ली

वो ऑंखों में अश्कों का दरिया समेटे,
वो उम्मीद का इक नज़रिया समेटे

यहॉं कह रही है वहॉं कह रही है,
तडप करके ये एक मॉं कह रही है

कोई पूँछता ही नहीं हाल मेरा…..!
कोई ला के दे दे मुझे लाल मेरा

उसे ले के वापस चली जाऊँगी मैं,
पलट कर कभी फिर नहीं आऊँगी मैं

बुढापे का मेरे सहारा वही है,
वो बिछडा तो ज़िन्दा ही मर जाऊँगी मैं

वो छ: दिन से है लापता ले के आये,
कोई जा के उसका पता ले के आये

वही है मेरी ज़िन्दगी का कमाई,
वही तो है सदियों का आमाल मेरा

कोई ला के दे दे मुझे लाल मेरा!

ये चैनल के एंकर कहॉं मर गये हैं,
ये गॉंधी के बंदर कहॉं मर गये हैं

मेरी चीख़ और मेरी फ़रियाद कहना,
ये मोदी से इक मॉं की रूदाद कहना

कहीं झूठ की शख़्सियत बह ना जाये,
ये नफ़रत की दीवार छत बह ना जाये

है इक मॉं के अश्कों का सैलाब साहब,
कहीं आपकी सल्तनत बह ना जाये

उजड सा गया है गुलिस्तॉं वतन का
नहीं तो था भारत से ख़ुशहाल मेरा

कोई ला के दे दे मुझे लाल मेरा।

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इमरान प्रतापगढ़ी मुशायरा

  • लड़कपन का नशा उस पर मुहब्बत और पागलपन, मेरी इस ज़िंदगी का ख़ूबसूरत दौर पागलपन !
    मेरे घरवाले कहते हैं बड़े अब हो चुके हो तुम, मगर मन फिर भी कहता है करूं कुछ और पागलपन !!
    हवा के साथ उड़ने वाले ये आवारगी के दिन, मेरी मासूमियत के और मेरी संजीदगी के दिन !
    कुछेक टीशर्ट, कुछेक जींस और एक कैप छोटी सी, मेरे लैपटॉप और मोबाइल से ये दोस्ती के दिन !!
    अजब सी एक ख़ुशबू फिर भी घर में साथ रहती है, कोई मासूम सी लड़की सफ़र में साथ रहती है……..!
  • मेरी बाइक की पिछली सीट जो अब तक अकेली है, इधर लगता है उसने कोई ख़ुशबू साथ ले ली है !
    मगर इस बीच मैं बाइक पे जब-जब बैठता हूं तो, मुझे लगता है कांधे पर कोई नाज़ुक हथेली है !!

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